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चीनी के वैश्विक दाम में वृद्धि न हुई तो बिना सब्सिडी के निर्यात मुश्किल

Last Updated- December 12, 2022 | 4:32 AM IST

व्यापार और उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय कीमत के मौजूदा स्तर से और अधिक मजबूत होने तक भारत से सफेद चीनी का बिना सब्सिडी समर्थन के निर्यात करना व्यावहारिक नहीं होगा। व्यापारियों का कहना है कि मौजूदा दरों पर कीमत उतनी अधिक आकर्षक नहीं है कि बिना सब्सिडी के बड़े पैमाने पर निर्यात किया जा सके। केंद्र सरकार ने कल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में आई मजबूती को देखते हुए चीनी निर्यात के लिए दी जाने वाली सब्सिडी में पिछले वर्ष के मुकाबले कमी कर दी।    
सब्सिडी को 6,000 रुपये प्रति टन (6 रुपये प्रति किलोग्राम) से कम कर 4,000 रुपये प्रति टन (4 रुपये प्रति किलोग्राम) कर दिया गया। हालांकि, व्यापारियों और उद्योग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि सरकार के इस निर्णय का 60 लाख टन निर्यात के मौजूदा सौदे पर अधिक असर नहीं पड़ेगा क्योंकि इसमें से 57 लाख टन के निर्यात के लिए पहले ही पुरानी सब्सिडी दरों पर समझौता हो चुका है। हालांकि, 60 लाख टन की अनुमति वाले हिस्से में से करीब 3 लाख टन चीनी के निर्यात के लिए अब 4,000 रुपये प्रति टन की कम सब्सिडी पर सौदा करना होगा। जबकि, निर्धारित सीमा से ऊपर चीनी के निर्यात के लिए सब्सिडी का समर्थन नहीं दिया जाएगा।
चीनी निर्यातों पर करीब 3,600 करोड़ रुपये की कुल अनुमानित सब्सिडी में से केंद्र गुरुवार के निर्णय के बाद करीब 60 करोड़ रुपये की बचत करेगा।
व्यापार से जुड़े सूत्रों ने कहा कि फिलहाल अंतराष्ट्रीय बाजारों में सफेद चीनी की कीमतें करीब 415 डॉलर से 420 डॉलर प्रति टन (एफओबी) पर बोली जा रही हैं और जब तक कीमतें 435 डॉलर से 440 डॉलर प्रति टन पर नहीं पहुंच जाती हैं तब तक सब्सिडी समर्थन के बिना निर्यात व्यावहारिक नहीं होगा।          
अखिल भारतीय चीनी व्यापारी संघ (एआईएसटीए) के उप चेयरमैन राहिल शेख ने कहा कि जहां तक सफेद चीनी की मांग और आपूर्ति का सवाल है तो इसको लेकर बहुत अधिक समस्या नहीं है क्योंकि ब्राजील में सूखा पडऩे के कारण वैश्विक आपूर्ति पर दबाव है जबकि भारत में चीनी का जबरदस्त भंडार उपलब्ध है।
शेख ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘फिलहाल पड़ोसी देश श्रीलंका, अफगानिस्तान और कुछ अफ्रीकी देशों से भारतीय सफेद चीनी की अच्छी मांग है जो केवल तभी व्यावाहरिक होगा जब वैश्विक कीमत मौजूदा स्तर से और अधिक मजबूत हो।’
उन्होंने कहा कि सामान्यतया श्रीलंका, अफगानिस्तान और अफ्रीकी देशों द्वारा हर महीने कुल मिलाकर 1,80,000 से 2,00,000 टन चीनी की खपत की जाती है जिसका मतलब है कि अगले 3 से 4 महीनों में इन देशों को करीब 7 लाख से 8 लाख टन चीनी का निर्यात किया जा सकता है।
मई में भारत के सफेद चीनी का भंडार करीब 2 करोड़ टन रहने का अनुमान है जबकि अगले तीन से चार महीनों में घरेलू मांग करीब 80 से 90 लाख टन रहेगी।
शेख ने कहा, ‘इसका मतलब है कि घरेलू मांग की पूरी तरह से आपूर्ति करने के बावजूद हमारे पास 1.1 करोड़ टन से 1.2 करोड़ टन का भारी भरकम अधिशेष बच जाएगा जिससे वैश्विक मांग की पूर्ति की जा सकती है लेकिन यह केवल तभी संभव होगा जब वैश्विक बाजारों में और अधिक सुधार आए।’

First Published - May 21, 2021 | 11:23 PM IST

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