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भारतीय परिवारों ने पाम तेल से किया किनारा, मांग घटी

Last Updated- December 15, 2022 | 5:09 AM IST

दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातक भारत में इस साल पाम तेल की मांग में गिरावट आने वाली है क्योंकि कोरोनावायरस के लॉकडाउन से खाद्य सेवा क्षेत्र की मांग में कमी आई है और घर-परिवारों ने बाजार में इसके विकल्पों को चुना है।
देश की अग्रणी खाद्य तेल रिफानर अदाणी विल्मर के उप मुख्य कार्यकारी अंगुश मलिक ने कहा कि 31 अक्टूबर को समाप्त होने वाले विपणन वर्ष 2019-20 में भारत का पाम तेल आयात पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत फिसलकर 75 लाख टन रहने के आसार हैं। देश की सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010-11 के बाद से यह सबसे कम आयात होगा। मलिक ने कहा कि लॉकडाउन के बाद होटल और रेस्त्रां उस तरह से नहीं खुल रहे हैं, जिस तरह की हम उम्मीद कर रहे थे। लोगों का उस तरह से बाहर जाना और खाना नहीं हो रहा है, जैसा पहले हुआ करता था।
पिछले दो दशकों के दौरान भारत में खाद्य तेल की खपत में तीन गुना इजाफा हुआ है क्योंकि आबादी बढ़ी है, आमदनी में वृद्धि हुई है और लोगों ने बाहर अधिक खाना शुरू कर दिया है।
पाम तेल सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला और आयात किया जाने वाला तेल बन चुका है, लेकिन ऐसा प्रमुख रूप से खाद्य प्रसंस्करणकर्ताओं जैसे इसके थोक खरीदारों और रेस्त्रां के मामले में ही है। भारतीय परिवार परंपरागत रूप से सूरजमूखी जैसे बढिय़ा विकल्पों का चयन करते हैं और इससे पाम तेल के सामने जोखिम बन गया है क्योंकि कोरोनावायरस का प्रसार रोकने के लिए लॉकडाउन ने घर से बाहर खाद्य खपत में कमी ला दी है।
खानपान केंद्रों और सड़कों पर बिक्री करने वालों का काम बंद होने का असर यह हुआ है कि खुदरा दुकानों पर कुल मांग में कमी आई है। उद्योग के भागीदारों का कहना है कि देश की राज्य सरकारें सालों से गरीबों को रियायती दामों पर पाम तेल उपलब्ध कराती रही हैं जिससे यह धारणा बन गई है कि यह बढिय़ा उत्पाद नहीं होता है।

First Published - July 7, 2020 | 11:54 PM IST

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