facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

घर में ही सिमट गयी बिहार की लीची

Last Updated- December 10, 2022 | 10:00 PM IST

प्रकृति की मार व सरकारी उपेक्षाओं के बीच बिहार की लीची राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी लाली खो रही है।
खास स्वाद के लिए मशहूर बिहार की लीची मार्केटिंग के अभाव में अपने राज्य में ही सिमटती जा रही है। जबरदस्त मांग के बावजूद किसानों को न तो सही कीमत मिल पा रही हैं और न ही लीची उद्यमी को राष्ट्रीय बाजार में उचित जगह।
थके हारे लीची उत्पादक अब किसी और फल की ओर मुखातिब होने का मन बना रहे हैं। हालांकि लीची के कारोबार में बढ़ोतरी के लिए इस साल पहली बार 22 मई से दिल्ली के प्रगति मैदान में लीची मेला का आयोजन किया जा रहा है। मेले में बिहार के लीची उत्पादक व उद्यमी को शामिल होने के लिए न्योता भेजा गया है।  
देश के कुल लीची उत्पादन में बिहार के मुजफ्फरपुर व आसपास के इलाकों का योगदान 70 फीसदी है। यहां हर साल 2.5-3 लाख टन लीची का उत्पादन होता है। मुजफ्फरपुर इलाके में लगभग 7 हजार हेक्टेयर जमीन पर लीची का उत्पादन होता है। लेकिन इस लीची की बिक्री के लिए बिहार में एक भी ऐसी मंडी नहीं है जहां किसान इसे ले जा सके और इसकी बोली लग सके।
लीची उत्पादकों को आज भी पुराने तरीके से ही लीची के पेड़ की बिक्री करनी पड़ती है। बिहार लीची ग्रोअर एसोसिएशन के प्रधान बीपी सिंह ने बिजनेस स्टैंडर्ड को मुजफ्फरपुर से फोन पर बताया, ‘एक एकड़ में लगे लीची के पेड़ की कीमत अधिकतम 10,000 रुपये मिलती है। इतनी कीमत भी तब मिलती है जब उस जमीन पर लगे पेड़ 20 साल से अधिक उम्र के होते हैं।
क्योंकि 20-30 साल की उम्र के पेड़ में सबसे अधिक लीची होती है। एक एकड़ में करीब 40 पेड़ होते हैं और उनसे लगभग 40 क्विंटल लीची का उत्पादन होता है। और 10 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से भी लीची की बिक्री करने पर उसकी कीमत 40,000 रुपये होती है। लेकिन किसानों को उसकी एक चौथाई कीमत से ही संतोष करना पड़ता है।’
वे कहते हैं कि तापमान में हो रही बढ़ोतरी के कारण भी लीची को बाजार तक ले जाने में दिक्कतें होती हैं। मुजफ्फरपुर स्थित नेशनल लीची रिसर्च सेंटर के निदेशक डा.केके कुमार कहते हैं, ‘पहले लीची को तोड़ने के दौरान 40 डिग्री सेल्सियस तक तापमान जाता था लेकिन अब यह तापमान 44 डिग्री तक चला जाता है। लिहाजा लीची फट जाती है।
और वह बाहर खासकर विदेशों में भेजने लायक बिल्कुल ही नहीं रह जाता है। और मात्र 30 फीसदी लीची ही बिहार से बाहर जा पाती है। पिछले साल 50 टन से भी कम लीची का निर्यात किया गया।’
मुजफ्फरपुर में लीची पल्प व और लीची केन के उत्पादन में जुटे उद्यमी एवं लीची उत्पादक केशव आनंद दुखी स्वर में कहते हैं, ‘यूरोप से लेकर मध्यपूर्व तक के देशों में बिहार की शाही लीची की भारी मांग है लेकिन वहां तक ले जाने का कोई इंतजाम नहीं है। जबकि चीन व थाइलैंड उत्तम तकनीक के कारण पूरे विश्व में लीची का निर्यात कर रहे हैं।’
उन्होंने बताया कि देश के अंदर लीची केन व लीची पल्प का बाजार 20-30 फीसदी की दर से बढ़ रहा है लेकिन फलों की रानी लीची को जल्दी और उचित तरीकों से बाहर भेजने की व्यवस्था के अभाव में दिल्ली व मुंबई तक मंडियों में लीची की आवक ठीक से नहीं हो पाती है।
बिहार से बाहर भेजने के चक्कर में इन दिनों लीची तोड़ने का काम समय से 10 दिन पहले शुरू हो रहा है इससे लीची की मिठास और गुदा में कमी आती है और बाजार में इसे औने-पौने दामों पर बेच दिया जाता है। लीची तोड़ने का काम मुख्य रूप से 20 मई के बाद शुरू होता है।

First Published - March 29, 2009 | 10:15 PM IST

संबंधित पोस्ट