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रेडियोएक्टिव तत्वों की जांच की सुविधा नहीं

Last Updated- December 10, 2022 | 5:58 PM IST

भारतीय समुद्री बंदरगाहों पर कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिससे निर्यात या आयात किए जाने वाले माल में खतरनाक रेडियोएक्टिव तत्वों की पहचान की जा सके।
इसी कमजोरी के चलते भारतीय बंदरगाहों से निर्यात किए जाने वाले तमाम निर्यात सौदों में अमेरिका और यूरोपीय संघ के बंदरगाहों पर 2007 से ही रेडियोएक्टिव तत्व पाए जा रहे हैं।
सरकारी अधिकारियों और निर्यातकों के मुताबिक इस समस्या की जड़ 3-4 साल पहले भारत में आयात किए गए रेडियोएक्टिव स्टील स्क्रैप हैं। इस स्क्रैप का प्रयोग इंजीनियरिंग के सामानों के पैकेजिंग सामग्री बनाने के लिए किया गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि जब निर्यात के सौदे रेडियोएक्टिव तत्वों के पैकेजिंग के बाद अमेरिका के बंदरगाहों पर 2007 में पहुंचे तो वहां पर खतरे की घंटी बजनी शुरू हो गई। लेकिन हकीकत में इस दूषित धातु की पहचान उस समय नहीं की जा सकी जब इसका निर्यात या आयात भारत के बंदरगाहों से किया गया, क्योंकि वहां पर रेडियोएक्टिव तत्वों की पहचान करने वाले संयंत्र ही नहीं लगे हैं।
एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘यहां के बंदरगाहों पर आधारभूत ढांचे में सुधार करने की जरूरत है। अब इस तरह की सुविधा उपलब्ध है, कि अगर खतरनाक या रेडियोएक्टिव तत्व का आयात या निर्यात किया जाता है, तो उसकी पहचान की जा सके। इसके साथ ही आयात किए जाने वाले स्क्रैप के मामले में भी पूरी जांच जरूरी है।’
इसके बारे में जब सीबीईसी के प्रवक्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि विभाग सामान्यतया निर्यात और आयात किए जाने वाले सौदे का मूल्यांकन करता है। साथ ही प्रतिबंधित सामग्री की भी जांच करता है, जो भारत में आयात की जाती हैं। उन्होंने कहा कि मुंबई के नजदीक न्हावा शेवा में कंटेनर सर्विलांस स्कैनर भी है। बंदरगाहों पर स्कैनिंग की प्रक्रिया को बढ़ाया जा रहा है।
पोर्ट अथॉरिटी के सूत्रों के मुताबिक भारत में ज्यादातर स्क्रैप का आयात कांडला बंदरगाह से होता है, जबकि कुछ और चेन्नई, विजग और तूतीकोरिन से आता है। सूत्रों ने कहा कि इनमें से किसी भी बंदरगाह पर ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिससे रेडियोएक्टिव तत्वों की जांच की जा सके। कई बार तो ऐसा होता है कि हथियारों के स्क्रैप आते हैं, जिसमें बंदूकें और ग्रेनेड शामिल हैं।
अगर देखें तो इन्हीं खामियों के चलते गाजियाबाद स्थित भूषण स्टील में 1994 में विस्फोट हुआ था, जिसमें कइयों की जान चली गई थी। इंजीनियरिंग सामानों के निर्यातक बताते हैं कि 2007 में कोलकाता बंदरगाह से करीब 200 कंटेनर भेजे गए थे, जिसमें रेडियोएक्टिव तत्व मिले थे। 
इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल के वरिष्ठ संयुक्त निदेशक सुरंजन गुप्ता ने कहा कि इन्हें या तो वापस भेज दिया गया था, या डुबा दिया गया। लेकिन यह हमारे लिए एक चेतावनी थी और इस मसले से निपटने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाया गया।
बहरहाल, इन सभी कवायदों के बावजूद अमेरिका और यूरोप के बंदरगाहों पर भारत से भेजे जाने वाले सौदों में रेडियोएक्टिव तत्व मिलते रहे। हाल ही में जनवरी महीने में मुंबई की एक कंपनी द्वारा निर्यात की गई सामग्री में रेडियोएक्टिविटी पाई गई।
हाल ही में हुई एक बैठक के दौरान स्टील मंत्रालय ने इस मसले पर विचार भी किया था। सरक ारी सूत्रों के मुताबिक मुंबई की इस कंपनी ने पैकेजिंग सामग्री का प्रयोग किया था, उसके लिए जिस स्टील स्क्रैप का प्रयोग किया गया उसका आयात रायगढ़ स्थित एक कंपनी विप्रास कास्टिंग्स लिमिटेड ने सीआईएस देशों से किया था।
स्टील मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘केवल एक ही मामला सामने आया है। सरकार ने जर्मनी स्थित उच्चायोग से जानकारी प्राप्त की है, जिसमें जर्मनी के स्थानीय अखबारों में छपी खबर के हवाले से कहा गया है कि भारत से आने वाले माल में रेडियोएक्टिव तत्व मिला है। इसके साथ ही एक और मीडिया रिपोर्ट आई है, जिसमें यह कहा गया है कि रेडियोएक्टिव तत्व खतरनाक स्तर पर नहीं हैं।’

First Published - February 26, 2009 | 12:21 PM IST

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