रबी फसल के दौरान तिलहन उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले करीब 18 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है।
सबसे अधिक सरसों के उत्पादन में लगभग 40 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है। हालांकि खाद्य तेलों के आयात में हो रही लगातार बढ़ोतरी से तिलहन किसानों को कोई खास लाभ मिलने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है।
गत खरीफ फसल के दौरान देश में कुल 150.7 लाख टन तिलहन का उत्पादन हुआ था। दि सेंट्रल आर्गेनाइजेशन फॉर ऑयल इंडस्ट्री एंड ट्रेड (कूईट) की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल रबी के दौरान कुल 95.8 लाख टन तिलहन उत्पादन का अनुमान लगाया गया है।
इनमें 65.5 लाख टन सरसों, 17 लाख टन मूंगफली, 7.5 लाख टन सूरजमुखी, 2.8 लाख टन तिल, 1.7 लाख टन करडी (सफोला) एवं 1.3 लाख टन लेमसीड के उत्पादन का अनुमान लगाया गया है। पिछले साल रबी के दौरान कुल 81 लाख टन तिलहन का उत्पादन हुआ था।
कूईट के कार्यकारी निदेशक डीएन पाठक ने बताया कि मुख्य रूप से राजस्थान में सरसों के रकबे में हुई बढ़ोतरी के कारण इस साल तिलहन उत्पादन में इजाफा नजर आ रहा है। पिछले साल राजस्थान में कुल 24.7 लाख हेक्टेयर जमीन पर सरसों की बुवाई की गयी थी जबकि इस साल यह रकबा बढ़कर 27.6 लाख हेक्टेयर हो गया।
हालांकि राजस्थान के सरसों किसान को अब कीमत सही नहीं मिलने की चिंता सताने लगी है। पाठक कहते हैं कि पिछले साल सरसों के भाव 2600 रुपये प्रति क्विंटल तक चले गए थे। लिहाजा अच्छी कीमत पाने की उम्मीद में किसानों ने अधिक जमीन पर इसकी बुवाई कर दी। लेकिन इस साल इसकी कीमत बढ़ने की जगह कम होने की संभावना है।
फिलहाल सरसों के दाम राजस्थान की मंडियों में 2000-2050 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर है जो कि जल्द ही 1800 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर आ सकते हैं। क्योंकि सरकार ने कच्चे सोयाबीन तेल के आयात को भी शुल्क मुक्त कर दिया है।
अब कच्चे पाम तेल के साथ कच्चे सोयाबीन तेल में भी बढ़ोतरी की संभावना है। सरकार पहले ही गत तीन महीनों में करीब 30 लाख टन तेल का आयात कर चुकी है। सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1830 रुपये प्रति क्विंटल है।
कारोबारियों का कहना है कि बाजार में सरसों की कीमत गिरने पर नेफेड को इसकी खरीदारी करनी पड़ेगी ताकि किसानों को उनका न्यूनतम मूल्य मिलता रहे। हालांकि नेफेड की तरफ से अभी इसकी तैयारी नहीं की गयी है।