सरकारी गोदामों में पड़े जरूरत से ज्यादा चावल को संभालने के इरादे से कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने धान की तयशुदा खरीद केवल छोटे और सीमांत किसानों से करने का सुझाव दिया है। खरीफ सत्र 2022-23 की अपनी नई मूल्य नीति रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि बाकी किसानों से केवल 2 हेक्टेअर जमीन पर पैदान धान खरीदा जा सकता है।
सीएसीपी ने कहा, ‘इससे खाद्य सुरक्षा के लिए पर्याप्त भंडार इकट्ठा हो जाएगा और 90 फीसदी से अधिक किसानों का हित भी बचा रहेगा।’ हालांकि यह सुझाव है, लेकिन अगर इन सुझावों को लागू किया गया तो देश में खाद्यान्न खरीद के तरीके में बड़ा बदलाव आ सकता है और अधिशेष खाद्यान्न को केंद्रीय भंडार में रखने तथा खरीदने के लिए मोटी सब्सिडी देने की जरूरत भी खत्म हो जाएगी।
इससे पंजाब और हरियाणा में बहुत से बड़े किसानों के धान की खरीद प्रभावित हो सकती है। वर्ष 2015-16 की गणना के मुताबिक पंजाब में औसत कृषि जोत 3.62 हेक्टेअर और हरियाणा में 2.22 हेक्टेअर है, जबकि राष्ट्रीय औसत 1.08 हेक्टेअर है। केंद्रीय भंडार के लिए धान की खरीद सीजन 2015-16 से 2020-21 के बीच करीब 76 फीसदी बढ़ी है। 2015-16 में 5.12 करोड़ टन धान खरीदा गया था और 2020-21 में 8.95 करोड़ टन खरीदा गया।
आयोग खाद्य के भंडार और सब्सिडी के प्रबंधन के लिए देश में खुली खरीद को समाप्त करने की लंबे समय से वकालत कर रहा है। लेकिन इसने शायद पहली बार इसे हासिल करने का खाका सामने रखा है।
2015-16 की कृषि गणना के मुताबिक दो हेक्टेअर से कम जमीन वाले लघु एवं सीमांत किसानों की देश की कुल कृषि जोतों में 86 फीसदी हिस्सेदारी है। लेकिन जब बात उन जोतों की आती है, जिन पर खेती हो रही है तो लघु एवं सीमांत किसानों की हिस्सेदारी 47 फीसदी ही है। इसके विपरीत मझोले और बड़े किसानों की देश की कुल कृषि जोतों में केवल 14 फीसदी हिस्सेदारी है। लेकिन खेती में इस्तेमाल हो रही जोतों में उनकी हिस्सेदारी 53 फीसदी है।
आईजीआईडीआर और सीएसीपी के पूर्व चेयरमैन डॉ. एस महेंद्र देव ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘केवल लघु एवं सीमांत किसानों से धान की खरीद का सुझाव कागजों में अच्छा लगता है, लेकिन इसे लागू करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि मझोले और बड़े किसानों को भी लाभप्रद कीमतों की जरूरत है। साथ ही लघु एवं सीमांत किसानों के पास बेचने योग्य उपज कम ही बचती है। इसके अलावा बड़े किसानों को चुप रखना भी मुश्किल होगा।’
सीएसीपी ने यह भी कहा कि उतना ही खाद्यान्न खरीदा जाना चाहिए, जितना सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अन्य कल्याणकारी योजनाओं को आसानी से चलाने तथा बफर स्टॉक के लिए जरूरी है। इसके साथ ही किसानों को धान कम उगाने और तिलहन एवं दलहन जैसी अन्य फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘आयोग ने सुझाव दिया है कि खाद्यान्न उत्पादक किसानों को चावल और गेहूं नहीं उगाने पर होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कीमत अंतर भुगतान योजना के सही तरीके खोजे जाएं।’
सीएसीपी की रिपोर्ट में व्यापार नीति और कीमत सहायता नीति में तालमेल रखने की वकालत भी की गई है।