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हरित हाइड्रोजन नीति से आरआईएल, एलऐंडटी को फायदा

Last Updated- December 11, 2022 | 9:06 PM IST

भारत की पहली हाइड्रोजन नीति में देश को ऊर्जा आयातक से हरित हाइड्रोजन निर्यात का केंद्र बनाने की क्षमता है, यह मानना है विश्लेषकों का। विश्लेषकों ने कहा है कि यह नीति न सिर्फ हरित हाइड्रोजन के कारोबार को काफी व्यावहारिक बना देगी बल्कि यह संभावित तौर पर भारत को वैश्विक स्तर पर सबसे सस्ते उत्पादक के तौर पर भी खड़ा कर देगी।
एडलवाइस सिक्योरिटीज ने एक नोट में कहा है, भारत पहले ही कोयला, गैस व पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाले ग्रे हाइड्रोजन का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक व उपभोक्ता है। उपभोग में 54 फीसदी हिस्सदारी रिफाइनरी की है जबकि बाकी उपभोग मोटे तौर पर उवर्रक मेंं होता है। अक्षय ऊर्जा की कम लागत के भारत के लाभ को देखते हुए देश में हरित हाइड्रोजन की लागत वैश्विक स्तर के मुकाबले घटकर करीब एक चौथाई और ग्रे हाइड्रोजन की लागत एक डॉलर प्रति किलोग्राम से कम होने की संभावना है, जो देश को संभावित तौर पर विश्व में सबसे कम लागत वाला उथ्पादक बना देगा।
पिछले हफ्ते केंद्र ने देश की पहली हरित हाइड्रोजन नीति की पेशकश की। सरकार का मकसद जीवाश्म र्ईंधन का इस्तेमाल घटाना और हरित ईंधन के प्रसार में इजाफा करना है और यह साल 2021 में स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावित राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन के मुताबिक है। नई नीति में ग्रीन हाइड्रोजन (जीएच) व ग्रीन अमोनिया के विनिर्माताओं व उपभोक्ताओं को कई तरह से प्रोत्साहन दिए गए हैं।
जेएम फाइनैंशियल के विश्लेषकों के अनुसार, नीति में जीएस खरीदारी और सरकारी एजेंसियों द्वारा मांग के संभावित समेकन पर जोर दिया गया है जिससे बोलीदाताओं को मजबूत अनुबंध हासिल करने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि आरई मांग को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि ग्रीन हाइड्रोजन/अमोनिया के लिए मांग पावर सेल एग्रीमेंट्स के साथ नई आरई निविदाओं के 125 जीडब्ल्यू को सुनिश्चित करती है।
इलारा कैपिटल ने भारत में ग्रीन हाइड्रोजन मांग वर्ष 2030 तक न्यूनतम 18.4 लाख टन और वर्ष 2050 तक 3.3-4.4 करोड़ टन पर पहुंच जाने का अनुमान जताया है, जो मौजूदा समय में शून्य है। इससे वर्ष 2030 तक 13जीडब्ल्यू इलेक्ट्रोलीजर क्षमता के लिए मांग पैदा होगी और वर्ष 2050 तक 200 जीडब्ल्यू से ज्यादा इलेक्ट्रोलीजर क्षमता की राह पर बढऩे में मदद मिलेग। ब्रोकरेज ने कहा है, ‘हमें विश्वास है कि भारत में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन तंत्र कैलेंडर वर्ष 2050 तक बढ़कर 322-427 अरब डॉलर (भंडारण, परिवहन, रिफ्यूलिंग इन्फ्रा पर निवेश को छोड़कर) का हो सकता है।’लागत के मोर्चे पर गोल्डमैन सैक्स का मानना है कि भारत की प्रतिस्पर्धी विद्युत दरें मध्यावधि में हाइड्रोजन उत्पादन के लिए कम खर्च को बढ़ावा देने में प्रतिस्पर्धी बढ़त के लिहाज से कारगर साबित हो सकती हैं।
मॉर्गन स्टैनली का कहना है, ‘भारत सबसे कम अक्षय ऊर्जा दर के साथ कोयला और गैस जैसे वैकल्पिक ईंधनों के मुकाबले अत्यधिक प्रतिस्पर्धी कीमत पर ग्रीन हाइड्रोजन का निर्माण कर सकता है।’विश्लेषकों का यह भी कहना है कि सरकार को ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग को राहत देने के लिए सरकार से और ज्यादा नीतिगत समर्थन की जरूरत है।

First Published - February 22, 2022 | 11:21 PM IST

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