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डॉलर के मुकाबले नए निचले स्तर पर रुपया, कच्चे तेल की महंगाई से दबाव

सोमवार को रुपया करीब 0.2 फीसदी की गिरावट के साथ नए निचले स्तर 95.09 पर बंद हुआ

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अंजलि कुमारी   
Last Updated- May 04, 2026 | 10:51 PM IST

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 0.2 फीसदी गिरकर 95.09 के नए निचले स्तर पर बंद हुआ। बाजार के जानकारों ने बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचकर अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए शायद हस्तक्षेप किया। 

डीलरों ने बताया कि घरेलू मुद्रा ने अपनी शुरुआती बढ़त गंवा दी, जो पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत के बाद मिली थी। इसकी शुरुआती उम्मीदें मुद्रा बाजारों में ज्यादा देर तक नहीं टिकीं।  गुरुवार को रुपया 94.92 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। मौजूदा कैलेंडर वर्ष में घरेलू मुद्रा डॉलर के मुकाबले 5.48 फीसदी कमजोर हुई है जबकि मौजूदा वित्त वर्ष में यह 0.29 फीसदी टूटी है।

एचडीएफसी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ शोध विश्लेषक दिलीप परमार ने कहा, भारतीय रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है क्योंकि डॉलर मजबूत हो रहा है और कच्चे तेल की कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। तेल की कीमतों में लगातार हो रही इस बढ़ोतरी और विदेशी फंड के बाहर जाने से भारत के व्यापार संतुलन और पूरी अर्थव्यवस्था पर साफ तौर पर दबाव पड़ रहा है। डॉलर की लगातार मांग की वजह से फिलहाल कुछ समय के लिए रुपये पर दबाव बने रहने की उम्मीद है, जिससे रुपया 95.35 और 95.70 के स्तर की ओर बढ़ सकता है। 

इस बीच, बाजार के जानकारों का कहना है कि आरबीआई शायद 2013 में शुरू की गई फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (एफसीएनआर) जमा जैसी ही कोई योजना लाने पर विचार कर रहा है। टेपर टैंट्रम के दौर में शुरू किए गए इस कार्यक्रम की मदद से बैंकों ने प्रवासी भारतीयों को डॉलर जमाओं के लिए प्रोत्साहित करके तीन साल में करीब 38 अरब डॉलर जुटाए थे।

फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएपी में ट्रेजरी के प्रमुख और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा, एक खबर यह भी थी कि आरबीआई 2013 में शुरू की गई एफसीएनआर योजना की तरह ही एक और योजना लाने पर विचार कर रहा है, जिसका मकसद डॉलर जुटाना है। उस योजना के जरिये  आरबीआई ने तीन साल में 38 अरब डॉलर जुटाए थे। इससे डॉलर-रुपये की कीमत नीचे आ सकती है क्योंकि इस विनिमय दर को कम करने के लिए डॉलर की आवक सबसे ज़रूरी है। 

अगर ऐसी ही कोई पहल शुरू की जाती है तो इससे विदेशी मुद्रा की आवक बढ़ाकर रुपये पर पड़ने वाले दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। यह डॉलर-रुपये की चाल तय करने वाला अहम कारक है, खासकर ऐसे समय में जब पोर्टफोलियो प्रवाह एक जैसा नहीं है। ऐतिहासिक रूप से, पहले भी ऐसे प्रवाह का काफी असर देखने को मिला है। उस समय डॉलर की लिक्विडिटी में आई तेजी ने रुपये को डॉलर के मुकाबले 68 के स्तर से तेजी  से उबारकर लगभग 58 के स्तर तक पहुंचने में मदद की थी।

First Published : May 4, 2026 | 10:34 PM IST