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रुपये में आएगी ऐतिहासिक गिरावट? 97 के स्तर को छू सकता है भारतीय मुद्रा, सर्वे में डराने वाले संकेत

पश्चिम एशिया संकट और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण रुपया 97 प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर तक गिर सकता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा

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अंजलि कुमारी   
Last Updated- March 31, 2026 | 10:18 PM IST

बिज़नेस स्टैंडर्ड द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार पश्चिम एशिया में संघर्ष जारी रहने की ​स्थिति में रुपया 97 प्रति डॉलर के स्तर को छू सकता है। इस सर्वेक्षण में शामिल 10 प्रतिभागियों में अ​धिकतर का मानना था कि जून के आ​खिर तक रुपया कुछ संभलकर 96 प्रति डॉलर पर वापस आ जाएगा।

रुपये के लिए वित्त वर्ष 2025-26 वास्तव में 2011-12 के बाद का सबसे खराब वर्ष रहा। इस दौरान विदेशी निवेश समेटे जाने के कारण रुपये में 9.85 फीसदी की गिरावट आई। मार्च में कच्चे तेल की कीमतों में उबाल ने इस संकट को और गहरा कर दिया।

मार्च में डॉलर के मुकाबले रुपया 4 फीसदी से अधिक कमजोर हुआ।  रिजर्व बैंक द्वारा डॉलर की बिक्री किए जाने के बाद पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 95 प्रति डॉलर के स्तर को पार करने के बाद 94.81 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।

बार्कलेज ने एक रिपोर्ट में कहा, ‘हमारे नए पूर्वानुमानों से पता चलता है कि रुपया लगातार कमजोर होता रहेगा और वह 2027 की पहली तिमाही के अंत तक 97.4 प्रति डॉलर तक पहुंच जाएगा।’ 

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘रुपया तेल आपूर्ति के झटके के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बना हुआ है जबकि भारत के भुगतान संतुलन की स्थिति और बिगड़ सकती है। ऐसे में पूंजी एवं वित्तीय खातों पर दबाव बढ़ रहा है। आयातकों द्वारा डॉलर की खरीद में भी वृद्धि होने की संभावना है जो निर्यातकों द्वारा डॉलर की बिक्री को पीछे छोड़ सकती है।’ 

वित्त वर्ष 2026 में भुगतान संतुलन का घाटा 35 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। पूंजी निकासी व चालू खाते का घाटा बढ़ने से अगले वित्त वर्ष में भुगतान संतुलन का घाटा और बढ़ सकता है।

प्रतिभागियों ने कहा कि वैश्विक मौद्रिक परिदृश्य में सख्ती बरकरार रहने के आसार हैं। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में दरों में कोई महत्त्वपूर्ण कटौती की उम्मीद नहीं है। ऐसे में उभरते बाजार की मुद्राओं पर दबाव बरकरार रहेगा।

उधर आपूर्ति संबंधी व्यवधान के कारण कच्चे तेल की कीमतों के पिछले निचले स्तर यानी 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल पर लौटने की संभावना नहीं है। ऐसे में अगली कुछ तिमाहियों में मुद्रास्फीति बढ़ने और शेयर बाजारों पर दबाव पड़ने की आशंका है। बढ़ती मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक तनाव के कारण गिरावट दिख सकती है जिससे विदेशी पूंजी की निकासी को रफ्तार मिलेगी।

हालांकि रुपये में सितंबर के आसपास कुछ समय के लिए मजबूती दिख सकती है। उसे मुख्य तौर पर वैश्विक तनाव में संभावित नरमी और प्रमुख भू-राजनीतिक घटनाओं से पहले निवेशक धारणा में सुधार से बल मिलेगा। मगर व्यापक रुझान गिरावट का ही रहेगा क्योंकि वैश्विक जोखिमों में तत्काल सुधार होने की संभावना नहीं है।

आईएफए ग्लोबल के संस्थापक और सीईओ अभिषेक गोयनका ने कहा, ‘चालू एवं पूंजी खाते के लिहाज से रुपये में कुछ गिरावट जारी रहने के आसार हैं। मौजूदा भू-राजनीतिक स्थिति बेहद अनिश्चित है और जब तक ईंधन की कीमतों में तेजी बरकरार रहेगी, तब तक रुपये पर दबाव बरकरार रहेगा। भले ही ​स्थिति शांत हो जाए लेकिन रुपये में तेजी या भारी उलटफेर के आसार नहीं दिख रहे हैं।’ 

गोयनका ने कहा, ‘आरबीआई एक मजबूत आधार बनाने के लिए दखल दे सकता है। इससे भारत में निवेश करने के इच्छुक लोगों को निवेश का अच्छा अवसर मिलेगा। इससे खोए हुए मुद्रा भंडार को तेजी से वापस हासिल करने और बाहरी स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी। मार्च के पहले तीन सप्ताहों के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 30 अरब डॉलर घट गया। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के समय से ही इसमें गिरावट दर्ज की जा रही है। रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों की विदेशी मुद्रा ​स्थिति पर लगाई गई सीमा से रुपये पर पड़ रहे अंदरूनी दबाव को कम करने में ज्यादा मदद नहीं मिली है। इस कदम से मिली शुरुआती राहत भी तेजी से खत्म हो गई। बाजार के जानकारों का कहना है कि नेट ओपन पोजिशन के बारे में जारी निर्देश के कुछ ऐसे नतीजे भी सामने आ सकते हैं जिनकी उम्मीद नहीं थी।

केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार को जारी एक निर्देश में बैंकों की दैनिक ‘नेट ओपन फॉरेक्स पोजीशन’ की सीमा 10 करोड़ डॉलर तय कर दी है। यह नियम 10 अप्रैल तक लागू हो जाएगा और इसके साथ ही बैंकों की पूंजी से जुड़ी पिछली आंतरिक सीमाएं समाप्त हो जाएंगी।

First Published : March 31, 2026 | 10:18 PM IST