रबी की फसल की बुआई जोर पकडऩे वाली है, ऐसे में डाई अमोनिया फॉस्फेट (डीएपी) की कमी का दबाव एनपीके, एमओपी और अन्य श्रेणी के मिश्रित उर्वरकों पर पड़ सकता है।
व्यापार और उद्योग के सूत्रों ने कहा कि सरकार की सब्सिडी नीति डीएपी के पक्ष में है। वहीं गैर डीएपी मिश्रित उर्वरकों के विनिर्माताओं का मुनाफा प्रभावित होगा, अगर वे उत्पादन की बढ़ी लागत अंतिम उपभोक्ताओं यानी किसानों पर नहीं डालते हैं।
देश में यूरिया के बाद सबसे ज्यादा डीएपी का इस्तेमाल होता है। रबी सीजन की बुआई खासकर आलू और चने की बुआई में इसका बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है।
विभिन्न श्रेणी के नाइट्रोजन (एन), फास्फोरस (पी) और पोटैशियम (के) और म्यूरिएट आफ फास्फोरस (एमओपी) डीएपी के विकल्प हैं। डीएपीके में पोटैशियम की मात्रा बहुत मामूली और फास्फोरस पर्याप्त होता है। यूरिया में नाइट्रोजन की मात्रा सबसे ज्यादा होती है। डीएपी की कमी के कारण एनपीके और एमओपी की खुदरा कीमतें बढ़ गई हैं। उद्योग जगत का कहना है कि हाल के दौर के सब्सिडी समर्थन के बावजूद डीएपी की उपलब्धता अभी भी पर्याप्त नहीं है, जबकि ज्यादातर सब्सिडी डीएपी के लिए दी गई है।
भारत में डीएपी की खपत का आधा उत्पादन घरेलू है। एनपीकेएस (एस यानी सल्फर) के मामले में 80-90 प्रतिशत उत्पादन भारत में होता है। जहां तक डीएपी का सवाल है, आंकड़ों से पता चलता है कि 30 सितंबर, 2021 तक , जब रबी की बुआई का सीजन शुरू होता है, भंडार में 20.7 लाख टन डीएपी था, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 59 प्रतिशत कम है। 30 सितंबर, 2021 को एनपीकेएस का स्टॉक 32.4 लाख टन था, जो पिछले साल की तुलना में 10 प्रतिशत कमहै, जबकि एमओपी का स्टॉक 9,60,000 टन है, जो पिछले साल की तुलना में 53 प्रतिशत कम है।
अक्टूबर, 2021 से मार्च, 2022 तक भारत को 52.5 लाख टन अतिरिक्त डीएपी, 54.6 लाख टन एनपीकेएस और 15.5 लाख टन एमओपी की जरूरत होगी। इसके अलावा उर्वरक मंत्रालय के मुताबिक 169.1 लाख टन यूरिया की जरूरत होगी। डीएपी और अन्य मिश्रित उर्वरकों का स्टॉक कम हो गया, क्योंकि कंपनियों ने कच्चे माल व तैयार उत्पाद दोनों का ही आयात कम कर दिया। अंतरराष्ट्रीय दाम में तेज बढ़ोतरी के कारण ऐसा किया गया। सूत्रों ने कहा कि अमोनिया के मामले में देखें तो जून में सब्सिडी की घोषणा और अक्टूबर में ताजा घोषणा के बीच लागत और माल ढुलाई करीब 150 डॉलर प्रति टन बढ़ी है। वहीं पोटैशियम की कीमत करीब 220 डॉलर प्रति टन सिर्फ एक महीने में बढ़ी है। वहीं मार्च और सितंबर 2021 के बीच फास्फोरिक एसिड की कीमत 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 1,160 डॉलर प्रति टन हो गई है, जो 755 डॉलर प्रति टन थी। कारोबारी उम्मीद कर रहे हैैं कि फास्फोरिक एसिड की कीमत 100 डॉलर प्रति टन और बढ़ेगी।