प्रतीकात्मक तस्वीर
सोने की कीमतें निकट अवधि में सीमित दायरे में रह सकती हैं, क्योंकि निवेशक ऊंची ब्याज दरों की संभावना, मजबूत अमेरिकी डॉलर और बढ़ी हुई बॉन्ड यील्ड जैसे मिले-जुले व्यापक आर्थिक संकेतों का आकलन कर रहे हैं। हालांकि, केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और वैश्विक कर्ज के बढ़ते बोझ को लेकर चिंताओं के कारण इस कीमती धातु का लॉन्ग टर्म आउटलुक पॉजिटव बना हुआ है। टाटा म्युचुअल फंड ने जून 2026 के अपने मार्केट आउटलुक रिपोर्ट में यह जानकारी दी।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका-ईरान तनाव और अन्य भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते सोने की कीमतों में शॉर्ट टर्म में लगभग 5 फीसदी तक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। हालांकि भारतीय निवेशकों के लिए रुपये में कमजोरी एक सुरक्षा कवच का काम कर सकती है, जिससे घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट का जोखिम सीमित रहेगा और वे अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तुलना में अपेक्षाकृत मजबूत बनी रह सकती हैं।
रिपोर्ट में चरणबद्ध (स्टैगर्ड) निवेश रणनीति अपनाने की सलाह दी गई है। इसके तहत निवेशकों को सुझाव दिया गया है कि वे कीमतों में आने वाली किसी भी गिरावट या सुधार (करेक्शन) का उपयोग धीरे-धीरे निवेश बढ़ाने और सोने में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के अवसर के रूप में करें।
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रिपोर्ट में जिन प्रमुख घटनाक्रमों का उल्लेख किया गया है, उनमें सरकार द्वारा सोने पर आयात शुल्क को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी करना शामिल है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब कच्चे तेल के बाद सोना भारत का दूसरा सबसे बड़ा आयातित उत्पाद बनकर उभरा है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने अनुमानित 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया, जो देश के एक्सटर्नल बैलेंस पर इस धातु के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है। नीति-निर्माता डॉलर के बढ़ते आउटफ्लो को लेकर चिंतित हैं, खासकर तब जब पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 फीसदी हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में तेल आयात में कटौती की गुंजाइश सीमित है। इसलिए सरकार ने उन अन्य बड़े आयातों पर ध्यान केंद्रित किया है जिनके लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च होते हैं। सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने का उद्देश्य इसकी मांग को नियंत्रित करना और चालू खाता घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) पर दबाव कम करना है।
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल 13-14 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।
सोने की कीमतों को लंबे समय तक मजबूती देने वाले प्रमुख कारणों में केंद्रीय बैंकों की लगातार बढ़ती खरीदारी शामिल है।
रिपोर्ट के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस के करीब 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज किए जाने की घटना ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के रिजर्व मैनेजमेंट के नजरिए को बदल दिया। इस घटनाक्रम ने यह दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय फाइनैंशियल सिस्टम में रखे विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं और विशेष परिस्थितियों में उन तक पहुंच सीमित की जा सकती है। इसके बाद से केंद्रीय बैंकों के बीच फिजिकल सोने को रिजर्व एसेट के रूप में रखने की रुचि बढ़ी है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी सोने के सक्रिय खरीदारों में शामिल रहा है। वर्ष 2024 में RBI ने 72.6 टन सोने की खरीद की, जिससे वह उस वर्ष सोना खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा केंद्रीय बैंक बन गया। 2025 तक भारत का कुल स्वर्ण भंडार बढ़कर लगभग 880 टन पर पहुंच गया।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है। यह जुलाई 2024 के 8.4 फीसदी से बढ़कर जनवरी 2026 में 16.2 फीसदी पर पहुंच गई।
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह रुझान वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों द्वारा अपने रिजर्व में डायवर्सिफिकेशन लाने और पारंपरिक फिएट मुद्राओं पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की व्यापक रणनीति को दर्शाता है।
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सोने की मांग मुख्य रूप से ब्याज दरों, महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारकों पर निर्भर करती है। वहीं, चांदी को दोहरा फायदा मिलता है, क्योंकि यह न केवल एक कीमती धातु है बल्कि उद्योगों में भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती है।
रिपोर्ट के अनुसार, हालिया गिरावट के बाद चांदी की कीमतों में कुछ समय तक ठहराव या सीमित दायरे में कारोबार देखने को मिल सकता है। वैश्विक आर्थिक वृद्धि को लेकर कमजोर होते अनुमान, सौर ऊर्जा परियोजनाओं की रफ्तार में कमी और सट्टेबाज निवेशकों द्वारा लॉन्ग पोजिशन में कटौती से बाजार में सप्लाई संबंधी दबाव कम हुआ है, जिससे निकट अवधि में तेजी की धारणा कुछ कमजोर पड़ी है। इसके बावजूद चांदी के लॉन्ग टर्म फंडामेंटल मजबूत बने हुए हैं।
ग्लोबल चांदी बाजार 2026 में लगातार छठे साल सप्लाई डेफिसिट की ओर बढ़ रहा है, यानी मांग उपलब्ध सप्लाई से ज्यादा बनी हुई है। चांदी की मांग का सबसे बड़ा स्रोत औद्योगिक खपत है, जिसे सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर्स से सहारा मिल रहा है।
चांदी के बाजार में चीन एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनकर उभरा है। 2026 की पहली तिमाही में चीन में चांदी की मांग आठ साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई, जबकि उसके घरेलू भंडार में तेज गिरावट दर्ज की गई। ग्लोबल चांदी रिफाइनिंग क्षमता का लगभग 60-70 फीसदी हिस्सा चीन के नियंत्रण में है। ऐसे में वहां की नीतियों में कोई भी बदलाव ग्लोबल सप्लाई चेन पर बड़ा असर डाल सकता है।
हाल में चीन द्वारा रिफाइनिंग गतिविधियों पर कुछ प्रतिबंध लगाए जाने से संभावित सप्लाई बाधाओं की आशंका बढ़ी है, जिससे चांदी की कीमतों के लॉन्ग टर्म आउटलुक को और मजबूती मिलती है।
हाल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद विश्लेषकों का मानना है कि सोने और चांदी को समर्थन देने वाले बुनियादी कारक अब भी मजबूत बने हुए हैं।
सोने की मांग को केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीद, बढ़ता भू-राजनीतिक विभाजन, वैश्विक कर्ज का ऊंचा स्तर और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में हो रहे प्रयासों से सहारा मिल रहा है। वहीं, चांदी को स्वच्छ ऊर्जा और एडवांस टेक से जुड़ी लंबी अवधि के औद्योगिक वृद्धि का लाभ मिलने की उम्मीद है।
हालांकि विश्लेषकों का यह भी कहना है कि दोनों धातुओं में हाल के वर्षों में अच्छी तेजी आ चुकी है। इसलिए निकट अवधि में इनमें तेज सुधार (करेक्शन) की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों के टलने और उधारी लागत बढ़ने की आशंका को सोने की कीमतों के लिए प्रमुख जोखिम माना जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार निवेशकों को चरणबद्ध (स्टैगर्ड) निवेश रणनीति अपनानी चाहिए, ताकि वे लंबी अवधि के पॉजिटिव आउटलुक का लाभ उठा सकें और साथ ही अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के जोखिम को भी संतुलित कर सकें।