घरेलू तेल कंपनियों पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स यानी अप्रत्याशित लाभ कर में केंद्र सरकार ने दूसरी बार बदलाव किया है। सरकार ने यह टैक्स 1 जुलाई से ही लगाया था। बार-बार के बदलाव की वजह से घरेलू तेल कंपनियों के लिए अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है, लेकिन विशेषज्ञ इस टैक्स की प्रकृति और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढाव के मद्देनजर इस बदलाव को तर्कसंगत मानते हैं।
पिछले महीने यानी 1 जुलाई को केंद्र सरकार ने कच्चे तेल के घरेलू उत्पादन पर 23,250 रुपये प्रति टन का विंडफॉल टैक्स लगाया था। साथ ही पेट्रोल और एटीएफ (जेट फ्यूल) के निर्यात पर 6 रुपये प्रति लीटर और डीजल के निर्यात पर 13 रुपये प्रति लीटर का विंडफॉल टैक्स लगाया गया था। सरकार को इस अतिरिक्त टैक्स से साल के बाकी महीनों में 94,800 करोड़ रुपये की कमाई का अनुमान था।
हालांकि सरकार ने बाद में 20 जुलाई को कच्चे तेल के घरेलू उत्पादन पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स को घटाकर 17,000 रुपये प्रति टन कर दिया। पेट्रोल पर इस अतिरिक्त टैक्स को घटाकर शून्य, डीजल पर 11 रुपये प्रति लीटर और एटीएफ पर 4 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया।
फिर उसके बाद सरकार ने 3 अगस्त से कच्चे तेल के घरेलू उत्पादन पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स को बढाकर 17,750 रुपये प्रति टन कर दिया। साथ ही एटीएफ के निर्यात पर इस अतिरिक्त टैक्स को घटाकर शून्य, और डीजल के निर्यात पर 11 रुपये प्रति लीटर से घटाकर पांच रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।
सरकार के इस कदम से जहां ओएनजीसी और वेदांत जैसी तेल उत्पादक कंपनियों को नुकसान होगा वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के लिए यह लाभप्रद हो सकता है।
सरकार की तरफ से जब पहली बार विंडफॉल टैक्स लगाया गया तब यह दलील दी गई थी कि इस कदम का मकसद घरेलू आपूर्ति को बढाना है क्योंकि तेल कंपनियां घरेलू जरूरतों के बजाय निर्यात को ज्यादा प्राथमिकता दे रही थीं। घरेलू तेल उत्पादक कंपनियों को जो अप्रत्याशित लाभ हो रहा था उस पर लगाम लगाने के लिए भी इस टैक्स को लगाया गया था। ये कंपनियां अपने उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर घरेलू तेल शोधक कंपनियों (रिफाइनर्स) को बेचती हैं।
बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस के मुताबिक आदर्श रूप से विंडफॉल टैक्स की एक निश्चित दर और एक निश्चित अवधि के लिए होनी चाहिए, लेकिन क्योंकि यह तेल कंपनियों पर लगाया जा रहा है, और तेल की कीमतों में उतार चढाव चलता रहता है, इसलिए अनिश्चितता स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा, "कंपनियों को उचित मूल्य के आंकलन के आधार पर आंतरिक गणना करनी चाहिए और अपने लाभ को इस अनिश्चितता से बचाव यानी हेज के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। सरकार को भी अपनी ओर से इन दरों को ठीक करना होगा क्योंकि जिन ग्लोबल फैक्टर्स की वजह से तेल की कीमतों में उतार चढाव होता है उनके मामले में सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती है।"
सबनवीस ने बताया कि एक अप्रत्याशित कर (विंडफॉल टैक्स) की प्रकृति यह है कि यह स्थिर नहीं होगा क्योंकि यह इस आधार पर है कि एक कंपनी अपने संचालन के कारण नहीं बल्कि जियो-पॉलिटिकल यानी बाह्य परिस्थितियों में बदलाव के कारण अप्रत्याशित लाभ कमाती है।
आईसीआरए के उपाध्यक्ष और सह-प्रमुख (कॉरपोरेट रेटिंग) प्रशांत वशिष्ठ ने कहा कि हालांकि निश्चित रूप से इन दरों में अक्सर बदलाव अनिश्चितता पैदा करता है, लेकिन कीमतों में ज्यादा तेजी को देखते हुए (कच्चे तेल की कीमतें लगातार $100/बैरल से ऊपर, जबकि क्रेक स्प्रेड $30/बैरल से ज्यादा) कई देशों ने अप्रत्याशित कर लगाए हैं और इसी कड़ी में एक उपाय के रूप में भारत इसे लागू करने वाला एकमात्र देश नहीं है।
उन्होंने कहा कि निर्यात शुल्क में फेरबदल तेल उत्पादों पर क्रैक स्प्रेड में होने वाले बदलाव के आधार पर किया जा रहा है, जो भू-राजनीतिक स्थिति, लॉकडाउन, इन्वेंट्री लेवल, मांग में उतार-चढ़ाव आदि के कारण ऊंचे लेकिन अस्थिर हैं।
इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री ने कहा कि चूंकि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बहुत अधिक अस्थिर हैं, इसलिए अप्रत्याशित कर दरों को थोड़े थोड़े अंतराल पर रिव्यू किया जाना चाहिए।
भारतीय तेल बास्केट की वैश्विक दरें दो अगस्त को 100.41 डॉलर प्रति बैरल थी, जो जुलाई में औसतन 105.49 डॉलर और जुलाई में 116.01 डॉलर थी।
ओपेक उत्पादकों की बैठक से पहले, ब्रेंट क्रूड वायदा बुधवार तड़के 94 सेंट गिरकर 99.60 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया।