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उपभोक्ताओं की दरकार है पैकेजिंग उद्योग को

Last Updated- December 07, 2022 | 8:04 PM IST

पैकेजिंग इंडस्ट्री द्वारा पिछले एक साल में अपने उत्पादों की कीमतें 60 से 70 फीसदी बढ़ाने के बाद तैयार उत्पादों को खरीदने के लिए उपभोक्ता नहीं मिल रहे हैं। 


उत्तर प्रदेश कोरयूगेटेड बॉक्स मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (यूपीसीबीएमए) के अध्यक्ष संजीव ढींगरा ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी होने से हमें पैकेजिंग उत्पाद की कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ रही है। ऐसे में उपभोक्ता हमारे माल को खरीदने से कतरा रहे हैं।

एक तो हमें कच्चे माल के लिए ज्यादा पैसा अदा करना पड़ रहा है। साथ ही उचित मात्रा में आपूर्ति न होने से  तीन करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा रोजाना हो रहा है। अनावश्यक करों की अदायगी,,कागज मिलों द्वारा कच्चे माल की कीमतों में मनमानी बढोतरी ,सरकार के उदासीन रवैये और बढ़ती महंगाई से हो रहे घाटे के खिलाफ पैकेजिंग कारोबारियों ने  6 से 10 अगस्त तक हड़ताल की थी।

लेकिन इस हड़ताल से भी कोई निष्कर्ष सामने नहीं आया है। काम रुकने के डर से कागज मिल मालिकों ने कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं करने का आश्वासन तो दिया है। लेकिन यह आश्वासन कब तक कारगर रहेगा, इसका पता नहीं है। वहीं दूसरी तरफ सरकार के कानों में तो जूं रेंगने का नाम ही नहीं ले रही है।

उत्तर प्रदेश में पैकेंजिग इंडस्ट्री की हालत सबसे ज्यादा खराब है। यहां पैकेजिंग कारोबार पिछले एक साल में 50 से 70 फीसदी तक सिमट गया है। उत्तर प्रदेश में  पैकेजिंग उत्पादों की लागत में लगभग 35 फीसदी तक तो कर ही होते हैं। इनमें 14.5 फीसदी की दर से उत्पाद शुल्क और 1 फीसदी की दर से प्रवेश शुल्क देना होता है।

इसके अलावा आयकर में भी किसी तरह की रियायत नहीं है। इसके बावजूद सरकार को हमारी दिक्कतें दिखाई नहीं पड़ रही है। उपभोक्ताओं द्वारा तैयार माल को न खरीदने के पैकेजिंग इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों को रोटी के लाले पड़ गए है। पैकेजिंग इंडस्ट्री के कारोबारियों का कहना है कि दीवाली तक कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी की फिर से संभावना है।

First Published - September 7, 2008 | 9:42 PM IST

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