मनोरंजन, फिल्म प्रदर्शन और फिल्म निर्माण के कारोबार से जुड़ा बड़ा समूह पिरामिड साइमीरा बढ़ती महंगाई से परेशान है। इस मैदान के दूसरे खिलाड़ियों की तरह पिरामिड साइमीरा को भी मंदी की आहट सुनाई दे रही है।
लगातार दूसरी तिमाही में उम्मीद से हल्का वित्तीय प्रदर्शन करने वाले इस समूह पर बढ़ती लागत का असर पड़ रहा है। पिरामिड साइमीरा समूह के प्रबंध निदेशक पी एस सामीनाथन से कारोबार की हालत, समूह की योजनाओं और रणनीतियों के बारे में ऋषभ कृष्ण सक्सेना ने बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:
मनोरंजन और फिल्म प्रदर्शन (मल्टीप्लेक्स) के कारोबार पर आपको महंगाई का असर कितना महसूस हो रहा है और आपके कारोबार पर इसकी कितनी चोट पड़ेगी?
अक्सर कहा जाता है कि मनोरंजन व्यवसाय मंदी से बेअसर रहता है, लेकिन हकीकत इससे उलट है। भारत में खास तौर पर लोग बचत पर ध्यान देते हैं और जब महंगाई बढ़ती है, तो वे गैर जरूरी खर्च पर रोक लगा लेते हैं। मैं तो यही समझता हूं कि अगर इस साल मनोरंजन उद्योग ने अच्छी खासी बढ़ोतरी कर ली, तो हम बहुत किस्मत वाले साबित होंगे।
महंगाई से बचने के लिए आप क्या कर रहे हैं?
महंगाई, दर्शकों का टोटा और खराब कारोबार का असर बड़ी कंपनियों के बजाय छोटी कंपनियों पर ज्यादा होता है। लोग खर्च कम करेंगे, तो छोटी कंपनियों का भट्ठा बैठेगा और ऐसे में विलय-अधिग्रहण होगा। इसलिए हम पर इसका मामूली फर्क ही पड़ेगा। हम भी महंगाई से बचने के लिए अधिग्रहण का रास्ता अपनाएंगे। इसके अलावा हम टिकट की कीमत कम करने के बजाय अपने विकास के लक्ष्य को कुछ कम कर लेंगे।
फिल्म निर्माण की लागत भी दिनोंदिन बढ़ रही है। आपको लगता है कि इसमें भी मुनाफा अब कम हो रहा है?
बिल्कुल। उत्तर भारत की फिल्मों के साथ तो ऐसा ज्यादा है क्योंकि वहां नामी अभिनेता ही निर्माता बन गए हैं और कॉर्पोरेट जगत के खिलाड़ी बेहद ऊंची कीमत पर वितरण अधिकार खरीदने लगे हैं।
हम जैसे कॉर्पोरेट खिलाड़ियों के आने से उद्योग पर उलटा असर ही पड़ा है क्योंकि सितारों की कीमत बढ़ गई है और सभी कुछ महंगा हो गया है। इससे कई छोटी कंपनियां बंद हो गई हैं और फिल्म कारोबार की तस्वीर ही बदल गई है। यह गलत कारोबारी मॉडल है और इसमें मुनाफा घटना तो तय है।
पिछले वित्त वर्ष में आपके शुद्ध मुनाफे में कमी आई थी और आपने कहा था कि सरकारी नीति में फेरबदल की वजह से ऐसा हुआ। लेकिन चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी मुनाफे में कमी देखी गई। इसकी क्या वजह रही?
पहली तिमाही में हमारे पास कम दर्शक आए। इस कारोबार में खर्च तय होते हैं, इसलिए दर्शक कम होने पर मुनाफे में जबरदस्त कमी आ जाती है। दर्शक कम होने की वजह आईपीएल भी था। इसके अलावा महंगाई भी कहीं न कहीं इसकी वजह रही ही होगी।
उत्तर भारत में आपकी मौजूदगी कम है? यहां के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं?
हम फिल्म बनाते हैं, दिखाते हैं और उनका वितरण भी करते हैं। फिल्म वितरण और प्रदर्शन के अच्छे तालमेल से ही हम कामयाब होते हैं। उत्तर भारत में बाजार काफी बिखरा है और यहां पांच-छह बड़े खिलाड़ी हैं। हम उन्हीं की जमात में शुमार होना नहीं चाहते। जब हम उत्तर भारत में गए, तो हमें घाटा ही हुआ। इसलिए हम वहां फिल्म वितरण और प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। शायद हम इन ऑर्गनिक तरीके से वहां पहुंचेंगे।
छोटे शहरों में आपको अपने लिए कितना बाजार दिख रहा है?
हमें तो लगता है कि महानगरों के मुकाबले छोटे शहरों में ही मनोरंजन का ज्यादा बड़ा बाजार है। मनोरंजन के लिहाज से महानगर बहुत मुनाफा नहीं दे सकते क्योंकि किराये बहुत ज्यादा हैं और दर्शक कम हैं।
भारत के बाहर आप और कौन से बाजार तलाश रहे हैं?
हम सिंगापुर, मलेशिया, अमेरिका वगैरह में कारोबार कर रहे हैं। इसी मिजाज के दूसरे बाजारों पर भी हमारी नजर है।
भारत से कुछ बड़ी कंपनियां साझे उपक्रम के जरिये हॉलीवुड पहुंच रही हैं। पिरामिड साइमिरा की भी ऐसा करने की योजना है?
पिछले साल थिएटर शृंखला फन एशिया का अधिग्रहण कर अमेरिकी बाजार में कदम रखने वाले हम पहले भारतीय मनोरंजन समूह थे। बाकी सब तो हमारे नक्श-ए-कदम पर चल रहे हैं। अमेरिका में हम विस्तार के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं।
आपकी कंपनी आईपीओ लाने वाली थी। उस दिशा में क्या चल रहा है? आईपीओ से मिली रकम का इस्तेमाल आप किस तरह करेंगे? क्या उसे आपके किसी खास कारोबार में लगाया जाएगा?
हमने फिलहाल आईपीओ टाल दिया है क्योंकि अभी हमें पैसे की जरूरत नहीं है। आईपीओ का मकसद वैसे भी रकम उगाहना नहीं, बल्कि अपनी कीमत बढ़ाना है।