ब्याज दरों में बढ़ोतरी और फंड हासिल करने में आ रही समस्याओं के चलते चालू वित्त वर्ष (2008-09) में भारतीय कंपनियों के निवेश में तकरीबन 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
पिछले छह माह से कॉरपोरेट घरानों को जहां फंड हासिल करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, वहीं वैश्विक वित्तीय संस्थानों को भी थोक फंड नहीं मिल पा रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर यही हाल आगे भी जारी रहा, तो अगले 12 माह में भारत में पूंजी निवेश में तकरीबन 132,000 से 176,000 करोड़ रुपये की गिरावट आ सकती है।
रिजर्व बैंक की ओर से किए गए अध्ययन में भी वर्ष 2008-09 के लिए निवेश में 148,350 करोड़ रुपये की कमी का अनुमान लगाया गया है। उनके मुताबिक, कंपनियों और वित्तीय संस्थाओं की ओर से 2008-09 में तकरीबन 173,173 करोड़ रुपये का निवेश की संभावना है, जबकि वर्ष 2007-08 में कंपनियों की ओर से करीब 245,107 करोड़ रुपये का निवेश किया गया था।
पिछले चार सालों के दौरान कंपनियों की ओर से 40 फीसदी सालाना की दर से निवेश किया गया था। वर्ष 2007-08 में जितनी राशि निवेश की गई थी, उनमें से 37.1 फीसदी विदेशों से कर्ज लिया गया था, जबकि 26.9 फीसदी धन इक्विटी बाजार से आया था। साथ ही 14.4 फीसदी राशि विदेशी संस्थागत निवेशकों के जरिए हासिल किया गया था, जबकि 21.6 फीसदी राशि अन्य स्रोतों से निवेश किया गया था।
पिछले वित्त वर्ष (2007-08) में 648 सूचीबद्ध कंपनियों की ओर से ही करीब 140,463 करोड़ रुपये का निवेश किया गया था। यह रकम सकल घरेलू उत्पाद का करीब 3 फीसदी, जबकि कंपनियों की कुल बिक्री का 13.3 फीसदी थी। यही नहीं, इस दौरान प्रमुख 25 कंपनियों ने औसतन 1000 करोड़ रुपये का निवेश किया था।
रिलायंस इंडस्ट्रीज इनमें सबसे अव्वल रही, जिसने 19,111 करोड़ रुपये का निवेश किया। हालांकि चालू वित्त वर्ष में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। वर्ष 2008-09 में अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियां, कच्चे तेल की कीमतों और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव से विकास पर असर पड़ने की आशंका है।
चालू वित्त वर्ष में भारतीय कंपनियों के निवेश में तकरीबन 30 फीसदी की गिरावट
जबकि पिछले चार सालों में हो रहा था करीब 40 फीसदी सालाना निवेश
महंगाई और मंदी की वजह से विस्तार योजनाओं पर असर