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हिमाचल में छोटे दवा उद्योग को लगा रोग

Last Updated- December 07, 2022 | 8:04 PM IST

हिमाचल प्रदेश के दवा उद्योग को इस साल भी दबाव से जूझना पड़ रहा है। इस उद्योग को उत्पादन में कमी और मुनाफा घटने के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।


राज्य का बद्दी बरोटीवाला इलाका 300 दवा इकाइयों का गढ़ है जिनमें 80 फीसदी से अधिक उद्योग लघु एवं मझोले उद्योग हैं। हिमाचल प्रदेश में दवा उद्योग को दो वजहों से दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

इनमें से एक वजह बजट में केंद्र सरकार द्वारा 2008-09 के लिए दवाओं पर उत्पाद शुल्क में कटौती की घोषणा है और दूसरी वजह चीन में ओलम्पिक को देखते हुए राज्य को एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है जिससे यह उद्योग प्रभावित हुआ है।

बद्दी बरोटीवाला नालागढ़ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के महासचिव और कान्हा बायोटेक के प्रॉपराइटर अरुण रावत यह स्वीकार करते हैं कि हिमाचल में एसएमई दवा उद्योग इस साल बुरे दौर से गुजर रहा है। रावत के मुताबिक केंद्र सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क को 16 फीसदी से घटा कर 8 फीसदी किया जाना शुल्क-मुक्त क्षेत्र के तहत काम करने वाली दवा इकाइयों को एक बड़ा झटका है।

उत्पाद शुल्क में कटौती से शुल्क मुक्त क्षेत्र में काम करने वाली दवा कंपनियों का उत्पादन तकरीबन 30 फीसदी तक प्रभावित हुआ है। चीन में ओलम्पिक के कारण भी यहां कई निर्माण इकाइयों को पर्यावरण स्तर पर एपीआई की आपूर्ति में कमी आने के कारण बंद कर दिया गया।

हिमाचल प्रदेश ड्रग मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय गुलेरिया ने बताया कि उत्पादन के लिए सामग्रियों की किल्लत के कारण राज्य के बड्डी क्षेत्र में दवा कंपनियों के उत्पादन में कमी आई है। एपीआई की आपूर्ति प्रभावित होने से दवा उद्योग को उत्पादन लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा है जिससे उनके मुनाफे पर चोट पड़ना लाजिमी है।

गुलेरिया कहते हैं कि अप्रैल से सितंबर तक की अवधि दवा उद्योग के लिए प्रॉफिट सीजन यानी मुनाफे वाला समय माना जाता है, लेकिन कच्चे माल की किल्लत के कारण दवा उद्योग के लिए यह प्रॉफिट सीजन आशाजनक नहीं रहा।

First Published - September 7, 2008 | 9:47 PM IST

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