भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) भारत से पूंजी निकासी को रोकने तथा रुपये को मजबूत बनाने के लिए ब्याज दरों में फिर से इजाफा कर सकता है। रुपये में लगातार कमजोरी आई है। भारत सरकार के 10 वर्षीय बॉन्ड और बेंचमार्क अमेरिकी बॉन्ड के बीच प्रतिफल अंतर ऐतिहासिक औसत की तुलना में कम बना हुआ है।
जीओआई बॉन्ड पर प्रतिफल मौजूदा समय में 10 वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड के मुकाबले 447 आधार अंक अधिक है, यह वर्ष 2010 के बाद से 528 आधार अंक के ऐतिहासिक औसत अंतर के मुकाबले 81 आधार अंक कम है। दरअसल, प्रतिफल अंतर पिछले साल दिसंबर के अंत में 494 आधार अंक था।
2012 की आखिरी तिमाही में प्रतिफल अंतर बढ़कर 490 आधार अंक हो गया था, जब रुपये पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक सख्ती का प्रभाव पड़ा था।
तुलनात्मक तौर पर प्रतिफल अंतर में ताजा गिरावट इसलिए आई है, क्योंकि अमेरिका में बॉन्ड प्रतिफल भारत के मुकाबले तेजी से बढ़ा है। 10 वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड पर प्रतिफल इस कैलेंडर वर्ष की शुरुआत के बाद से 140 आधार अंक तक अधिक है, वहीं 10 वर्षीय जीओआई बॉन्ड पर प्रतिफल 93 आधार अंक तक चढ़ा है। विश्लेषकों के अनुसार सीमित अंतर से यह रुपये की परिसंपत्तियों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के लिए कम आकर्षक बन गया है और इससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) द्वारा बिकवाली बढ़ाई जा सकती है और इसका रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
रुपये चालू वर्ष की शुरुआत के बाद से डॉलर के मुकाबले 6.8 प्रतिशत गिरा है, जो 2013 में प्रोत्साहन वापस लिए जाने की सात महीने की अवधि में उसके सबसे खराब प्रदर्शन में से एक के समान है। घरेलू मुद्रा गुरुवार को डॉलर के मुकाबले 79.88 रुपये पर बंद हुई, जबकि दिसंबर 2021 के अंत में यह 74.47 रुपये पर थी। रुपया 2021 कैलेंडर वर्ष के पहले सात महीनों के दौरान डॉलर के मुकाबले 0.3 प्रतिशत चढ़ा था।
भारतीय मुद्रा को एफपीआई द्वारा लगातार बिकवाली और बढ़ते व्यापार घाटे से दबाव का सामना करना पड़ा। व्यापार घाटे की वजह से विदेशी विनिमय भंडार में बड़ी गिरावट को बढ़ावा मिला, जो अपने ऊंचे स्तरों से घटकर करीब 50 अरब डॉलर के आसपास रह गया है।
इसे ध्यान में रखते हुए, आरबीआई ने बैंकों और कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा जमाएं और ऋण आकर्षित करने और उनकी राह आसान बनाने के लिए इस महीने के लिए कई नियामकीय उपायों की घोषणा की। केंद्रीय बैंक ने एफपीआई के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश को भी आसान बनाया है।
हालांकि विश्लेषकों को दर वृद्धि के अभाव में ऐसे उपायों के कारगर होने को लेकर संदेह है। जेएम फाइनैंशियल के धनंजय सिन्हा और हितेश सुवर्णा ने अपनी ताजा रिपोर्ट में लिखा है, ‘ 80-82 प्रतिशत पर ऊंचे कर्ज/जीडीपी अनुपात, और संभावित रुपया/डॉलर गिरावट को देखते हुए इसकी संभावना नहीं है कि सरकारी प्रतिभूतियों में बड़ा एफपीआई निवेश आएगा। ‘
उनके अनुसार, वित्त वर्ष 2023ई में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में अन्य 40-50 अरब डॉलर की कमी आने का जोखिम है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ रहा है।
पिछले समय में कई देशों ने अपनी मुद्राओं को सुरक्षित बनाने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि करने का सहारा लिया था। रूस के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दर इस साल फरवरी में 9.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत की, क्योंकि यूक्रेन पर हमला किए जाने के बाद रूबल में भारी गिरावट आ गई थी।