कभी अफीम की खेती में अपना झंडा बुलंद कर चुके उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के बाराबंकी जिले के किसानो के लिए मेंथा की खेती एक नई तरावट के एहसास की तरह है।
एक छोटे से कमरे में चलने वाले मेंथा ऑयल के कुटीर उद्योग ने बाराबंकी के किसानों की किस्मत पलट कर रख दी है। आज इस जिले में अफीम की खेती मुनाफे का धंधा नहीं रही है और मेंथा ने इसकी जगह ले ली है। बाराबंकी जिले में मेंथा की खेती करने वाले करीब करीब हर किसान के पास आज मेंथा का तेल निकालने वाली टंकियां हैं और इसने एक सोना उगलने वाले कुटीर उद्योग का रुप ले लिया है।
बाराबंकी में 1997 तक करीब 4000 हेक्टेयर क्षेत्र में अफीम की खेती की जा रही थी जो कि अब घटकर 1000 हेक्टेयर के आस-पास पहुँच गयी है। अफीम की खेती में लाइसेंस के झंझट और तय उपज देने की बाध्यता ने यह हालात पैदा किया है।
जिले के कृषि अधिकारियों का कहना है कि किसान अब सरकारी झमेले मे पड़ना ही नही चाहता है। जल्द मुनाफा, अच्छी उपज और सरकार के हस्तक्षेप से बचने के लिए आज बाराबंकी के 80 फीसदी किसान मेंथा की खेती से जुड़े हुए हैं जबकि अफीम के खेती के मामले में यह प्तिशत केवल पांच है।
बाराबंकी जिले के किसानों में यह बदलाव की बयार 1982 से बहनी शुरु हुयी जब मसौली ब्लाक के चंदनपुरवा गांव के कुछ किसान मेंथाल की खेती समझने के लिए मुरादाबाद गए। मसौली के ही किसान और अब राज मेंथा ऑयल के मालिक श्रीष दीक्षित का कहना है कि कुछ व्यापारियों ने सबसे पहले इस नयी खेती के बारे में बाराबंकी में जानकारी दी थी।
रोचक बात तो यह है कि अन्य फसलों की तरह मेंथा की खेती के लिए राज्य सरकार बीज, खाद और कीटनाशक के रुप में कोई भी अनुदान नही देती है। शारदा और इंदिरा नहरों से घिरे बाराबंकी के तान ब्लाकों में मेंथा की खेती को सिंचाई की भरपूर सुविधा मौजूद है जो कि इस खेती के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है।
मुरादाबाद, कोलकाता और दिल्ली के व्यापारी अब बिचौलियों को नजरअंदाज कर यहां के किसानों से सीधे माल खरीद रहे हैं। बड़ी जोतों वाले किसान मेंथा ऑयल निकाल कर लखनऊ-बहराइच राजमार्ग पर कुटीर उद्योग की तरह अपनी दुकानें खोल कर बैठे हैं और कुछ तो सीधे महानगरों में अपना सौदा तय कर लेते हैं।
मेंथा ऑयल का भाव रोज गिरता चढ़ता है और सभी स्थानीय समाचार पत्रों में इसके भाव दिए जा रहे हैं। बड़े व्यापारी तो इंटरनेट पर वेबसाइटों पर भी कीमत देख कर इसकी खरीद-फरोख्त करते हैं। मेंथा ऑयल के भाव में तेजी और मंदी का सर्किट 500 रुपए लीटर से लेकर 1100 रुपए लीटर तक होता है।
मसौली के एक बड़े व्यापारी प्रिंस कपूर के अनुसार इस समय करीब 120 करोड़ रुपए के मेंथा ऑयल का कारोबार इस जिले से हो रहा है जिसमें हर साल तेज इजाफा देखा जा रहा है। बंकी ब्लाक के किसान और मेंथाल के बड़े उद्यमी हरिनाम सिंह चौहान के मुताबिक लाल फीताशाही और लाइसेंस राज के चलते किसानों के लिए गन्ने और अफीम से मुफीद मेंथा की खेती है।
उनके अनुसार आज मेंथाल ऑयल ने जिले के हजारों किसानों को एक नए कुटीर उद्योग का रास्ता दिखा दिया है। अफीम की खेती में जहां एक पूर्व अनुमानित उपज किसान को सरकार को देनी पड़ती है वहीं उपज में कमी पर जुर्माना भरना पड़ता है । मेंथाल की खेती में एक बीघा की जोत वाला किसान कुल तीन महीनों में ही 10000 रुपए तक कमा लेता है।
अब जबकि किसानों ने मेंथाल का तेल निकालने का अपना उद्योग खोल लिया है तो गिरी से गिरी हालत में भी शुध्द मुनाफा 5000 रुपए बीघा से कम का नही है। किसानों के मेंथा ऑयल निकालने के धंधे में कूद पड़ने के बाद इलाके में लोहे की टंकियां बनाने का एक नया उद्योग भी शुरु हो गया है। आज सैकड़ों की तादाद में लोग लोहे की टंकी बनाने के कारोबार में कूद पड़े हैं।