सीमेंट उत्पादन क्षमताओं के विकास को देखते हुए एसीसी, अंबुजा और डालमिया सीमेंट कंपनियों के लिए सीमेंट की कीमतों में बढ़ोतरी मुमकिन नहीं हो पाएगी।
दरअसल कुछ समय पहले एक रिपोर्ट में कहा गया था कि लागत मूल्य के बढ़ते दबाव को झेल पाने में असमर्थ सीमेंट कंपनियां 50 किलो की सीमेंट की हर बोरी का दाम 20 रुपये से अधिक तक बढ़ा सकती हैं। पर उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि अब सीमेंट कंपनियों के लिए कीमतें बढ़ाना आसान नहीं होगा।
उनका कहना है कि नई उत्पादन इकाइयों के खुलने से सीमेंट का उत्पादन बढ़ा है। यह अलग बात है कि मौजूदा इकाइयों से क्षमता से कम उत्पादन किया जा रहा है। जानकारों ने बताया कि वित्त वर्ष 2009 में खपत की तुलना में 1 करोड़ टन अधिक सीमेंट का उत्पादन होने की उम्मीद है।
इस वर्ष 31 मार्च तक के आंकड़ों के अनुसार देश में सीमेंट उत्पादन क्षमता 19.86 करोड़ टन थी, जिसके वित्त वर्ष 2010 के आखिर तक 7 करोड़ टन और बढ़ने की संभावना है। सीमेंट मैनुफैक्चरर्स एसोसिएशन की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार इसमें से 3 से 3.5 करोड़ टन उत्पादन क्षमता का विकास तो मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान ही देखने को मिल सकता है।
क्रिसिल के शोध प्रमुख अजय डीसूजा ने बताया कि सीमेंट उत्पादन क्षमता के विकास से कीमतों के नरम पड़ने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि भले ही लागत में बढ़ोतरी हो रही है पर इसका भार सीमेंट कंपनियों को ही उठाना पड़ सकता है क्योंकि मौजूदा माहौल कीमतों में बढ़ोतरी के लिए अनुकूल नहीं है। हालांकि आर्थिक हालात के अलावा सरकार की ओर से कीमतें नहीं बढ़ाने का दबाव भी कंपनियों पर है।
सीमेंट की कीमतें बढ़ाने का उपयुक्त समय अभी नहीं है और यह मानना सिर्फ विश्लेषकों का ही नहीं है बल्कि खुद सीमेंट उत्पादक कंपनियां भी यह मानती हैं। बिनानी सीमेंट के प्रबंध निदेशक विनोद जुनेजा कहते हैं, ‘मांग और आपूर्ति को देखते हुए सीमेंट की कीमतें बढ़ाने पर विचार नहीं किया जा सकता है।’ पर इतना तय है कि अत्यधिक आपूर्ति और घटते परिचालन मुनाफे की वजह से अगले 12 से 18 महीनों में सीमेंट कंपनियों का प्रदर्शन जरूर बिगड़ेगा।
ग्रासिम और श्री सीमेंट का भी मानना है कि उद्योग पर काफी दबाव है। श्री सीमेंट के प्रबंध निदेशक एच एम बागुर ने बताया कि जब क्षमताओं का अत्यधिक विकास किया जाता है तो कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं देश की दूसरी सबसे बड़ी सीमेंट निर्माता कंपनी अल्ट्राटेक के कुमार मंगलम बिड़ला ने सालाना आम सभा की बैठक में कहा था कि नई क्षमताओं का असर वित्त वर्ष 2010 से देखने को मिलेगा और बाजार ताकतों के अनुसार कीमतों का निर्धारण होगा।
वहीं हाल ही में बिजनेस स्टैंडर्ड को दिए गए साक्षात्कार में अंबूजा सीमेंट के प्रबंध निदेशक ए एल कपूर ने बताया था कि जब कभी ऐसा समय आता है कि कंपनियां बाजार हिस्सेदारी को बढ़ाने की कोशिश करती हैं तो कीमतें गिरती हैं। वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि अगर कीमतें बढ़ती भी हैं तो वह प्रति बोरी 20 से 25 रुपये कर दर तो नहीं बढ़ सकती।
उन्होंने कहा, ‘अगर कीमतें बढ़ती भी हैं तो प्रति बोरी 2 से 5 रुपये से अधिक नहीं बढ़ सकती।’ वहीं कुछ दूसरे जानकारों का यह मानना भी है कि अगर सीमेंट कंपनियां कीमतें बढ़ाना चाहती हैं तो वे इसके बारे में 2 से 3 महीनों बाद ही सोच सकती हैं। उनका कहना है, ‘नई क्षमताओं के विकास के तुरंत बाद अगर कीमतें बढ़ाने की कोशिश की जाती है तो इससे कीमतें अचानक से काफी गिर सकती हैं।’