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टाटा को पहले भी गंवानी पड़ी हैं कई बड़ी परियोजनाएं

Last Updated- December 07, 2022 | 8:00 PM IST

टाटा मोटर्स की सिंगुर असफलता 2580 अरब रुपये वाले इस समूह के लिए कोई नई बात नहीं है। समूह को अक्सर इस तरह के मुश्किलों का सामना करना पड़ता रहा है।


हाल ही में जब टाटा मोटर्स ने सिंगुर में अपना काम बंद करने और नैनो कार के लिए वैकल्पिक जगह तलाशने की घोषणा की तो सरकारों या अन्य लोगों के साथ मतभेदों के कारण रद्द की गई परियोजनाओं की लंबी सूची में एक और अध्याय जुड़ गया।

हालांकि तमिलनाडु के तूतीकोरिन में 2500 करोड़ रुपये की इसकी टाइटेनियम परियोजना रद्द नहीं की गई थी, लेकिन उपेक्षा के कारण यह तकरीबन एक साल के लिए अधर में लटक गई। टाइटेनियम-डाई-ऑक्साइड के लिए खदान से जुड़ी यह परियोजना 10,000 एकड़ भूमि प्राप्त करने का इंतजार कर रही है। लेकिन तमिलनाडु सरकार समूह के लिए भूमि खरीद के लिए आगे नहीं बढ़ रही है।

टाटा स्टील के अधिकारी पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि वे अनिश्चित समय के लिए इंतजार नहीं कर सकते, क्योंकि यही मिनरल आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में भी मौजूद है। इस साल जुलाई में टाटा समूह ने बांग्लादेश में चार परियोजनाएं हासिल कीं जिनमें 1000 मेगावाट गैस-आधारित विद्युत संयंत्र, 500 मेगावाट का कोयला आधारित विद्युत संयंत्र शामिल थीं।

इसके अलावा समूह ने इशवर्दी में 10 लाख टन उर्वरक और 24 लाख टन इस्पात के निर्माण की भी योजना बनाई। इन परियोजनाओं की अनुमानित कीमत 17200 करोड़ रुपये है। हालांकि बांग्लादेश सरकार इन परियोजनाओं के लिए जरूरी प्राकृतिक गैस मुहैया नहीं करा सकती, इसलिए इन्हें टाल दिया गया।

इन सब के अलावा टाटा समूह ने सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया में 40 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश की। इस कोशिश के तहत समूह सिंगापुर एयरलाइंस के साथ घरेलू वायु क्षेत्र में दस्तक देना चाहता था, लेकिन सरकार ने उसके सपने पर पानी फेर दिया।

इसी तरह उड़ीसा में टाटा समूह को सफलता का स्वाद चखने का मौका नहीं मिला। पिछले दो दशकों में इस पूर्वी राज्य ने इस समूह की तीन परियोजनाओं को खो दिया है। टाटा स्टील ने 1995 में गोपालपुर में तकरीबन 20,000 करोड़ रुपये की पूंजी वाली एक करोड़ टन की इस्पात इकाई लगाने की घोषणा की थी। यह परियोजना चार चरणों में पूरी की जानी थी। प्रत्येक चरण के तहत 25 लाख टन इस्पात की योजना थी।

लेकिन गोपालपुर में स्थानीय लोगों के विरोध के कारण भूमि खरीद की प्रक्रिया में विलंब हुआ। इस विरोध के दौरान पुलिस फायरिंग में दो लोग मारे गए थे। हालांकि कंपनी  1999 में 2800 एकड भूमि के अधिग्रहण में सफल हो गई, लेकिन इसे 3000 एकड़ भूमि की जरूरत थी। लेकिन भूमि अधिग्रहण में अत्यधिक विलंब, जल सुविधा का अभाव समेत कई समस्याओं के कारण वर्ष 2000 में इस रोक देने की घोषणा कर दी गई।

गोपालपुर में टाटा की ओर से खरीदी गई भूमि खाली पड़ी है और कंपनी ने वहां एक मल्टी-प्रोडक्ट एसईजेड बनाने का प्रस्ताव रखा है। गोपालपुर की विफलता से पहले टाटा समूह ने चिलका झील परियोजना के लिए किस्मत आजमाई थी। 90 के दशक के शुरू में टाटा स्टील ने चिलका झील में झींगा की खेती के लिए 100 करोड़ रुपये की परियोजना की घोषणा की थी।

लेकिन पर्यावरणविदों के विरोध के बाद इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। इसी तरह 90 के दशक की शुरुआत में ही टाटा संस ने उत्कल अल्युमिना इंटरनेशनल लिमिटेड (यूएआईएल) के बैनर तले रायगढ़ जिले के काशीपुर में 10 लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी लगाने की योजना बनाई थी, लेकिन भूमि अधिग्रहण को लेकर स्थानीय लोगों के विरोध के कारण कंपनी को सफलता का स्वाद चखने का मौका नहीं मिला।

First Published - September 4, 2008 | 11:24 PM IST

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