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उद्योग पर कमजोर रुपये की मार

Last Updated- December 11, 2022 | 5:45 PM IST

भारतीय मुद्रा के अमेरिकी डॉलर की तुलना में अपने निचले स्तर के आसपास मंडराने से कई छोटी एवं मझोली कंपनियों के लिए राह अनिश्चित हो गई है, क्योंकि भारतीय कंपनियों द्वारा लिए गए  44 प्रतिशत विदेशी ऋण अभी भी असुरक्षित बने हुए हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से प्राप्त आंकड़े के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने इस साल मार्च में समाप्त वित्त वर्ष में करीब 38.2 अरब डॉलर की पूंजी जुटाई। इसमें से सिर्फ 56 प्रतिशत ऋण सुरक्षित हैं, जबकि शेष विदेशी ऋण असुरक्षित बने हुए हैं जिससे कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव का जोखिम बढ़ रहा है। कुछ असुरक्षित ऋण विदेशी विनिमय आय में स्वाभाविक तौर पर शामिल हो सकते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि साल के दौरान रुपये में और कमजोरी आ सकती है, क्योंकि विदेशी मुद्रा में ऋणों की परिपक्वता पूरी हो रही है। इसलिए, भारतीय कंपनियों को या तो तुरंत कवर करना होगा या नुकसान उठाना होगा। अंतरराष्ट्रीय वित्त विश्लेषक प्रबाल बनर्जी ने कहा, ‘हालांकि सॉफ्टवेयर निर्यातक समेत निर्यात कंपनियों को रुपये में गिरावट का लाभ मिलेगा। वहीं आयातक कंपनियां यदि अपनी पोजीशन को अपरिवर्तित बनाए रखती हैं तो उन्हें अपने वित्त पर गंभीर दबाव का सामना करना होगा। लेकिन किसी बड़ी कंपनी को अपनी फॉरेक्स देनदारी को, खासकर वैश्विक भूराजनीतिक हालात बिगड़ने के बाद, असुरक्षित बनाए रखने की अनुमति नहीं होगी।’ उन्होंने कहा कि ज्यादातर असुरक्षित ऋण छोटी और मझोले आकार की उन कंपनियों द्वारा लिए गए जो अब अपनी लागत में कमी लाना चाहती हैं।
बाह्य वाणिज्यिक उधारी, या विदेशी ऋण भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए वित्त के प्रमुख स्रोत के तौर पर लोकप्रिय हुए हैं। समय में वृद्धि के लिए कम वैश्विक ब्याज दरों की वजह से लागत लाभ के अलावा यह देश की ऋण वृद्धि में भी मददगार हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया कि मौजूदा समय में, भारत के बाहरी ऋण में ईसीबी का योगदान पिछले साल दिसंबर के अंत तक 36.8 प्रतिशत तक था।
रेटिंग फर्म मूडीज के अनुसार, ज्यादातर अच्छी रेटिंग वाली कंपनियों के पास मुद्रा में उतार-चढ़ाव के प्रभाव को सीमित करने की सुरक्षा होती है। इनमें राजस्व और लागत केंद्रित या अमेरिकी डॉलर से संबंधित स्वाभाविक हेजिंग यानी सुरक्षा शामिल है। मूडीज द्वारा भारत स्थित 23 कंपनियों को दी गई रेटिंग में से करीब 50 प्रतिशत के पास रुपये में कमजोरी से बचने की क्षमता है।
कॉरपोरेट ऋणदाताओं का कहना है कि कमजोर रुपये से आयातित माल की कुल लागत बढ़ती है, जिससे ऐसे उत्पादों के घरेलू निर्माताओं के लिए कीमतें बढ़ाने की गुंजाइश बढ़ जाती है।
जहां तेल एवं धातु की वैश्विक कीमतें मंदी की आशंका से बाद में नरम पड़ गईं, वहीं यह लाभ मौद्रिक उतार-चढ़ाव की वजह से समाप्त हो जाएगा, क्योंकि ब्याज लागत बढ़ जाएगी।

First Published - July 7, 2022 | 1:07 AM IST

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