वित्त वर्ष 23 की अप्रैल-जून तिमाही कृषि एवं संबंधित गतिविधियों की वृद्धि एक बार फिर स्थिर मूल्य पर 4.5 प्रतिशत रही है। मुख्य रूप से रबी की फसलों का उत्पादन बेहतर रहने और कुछ खाद्य वस्तुओं के दाम में तेज बढ़ोतरी की वजह से ऐसा हुआ है।
कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन क्षेत्र का जीवीए पिछले साल की समान अवधि में 2.2 प्रतिशत था। कृषि और संबंधित गतिविधियों की दीर्घावधि औसत वृद्धि 3.5 से 4 प्रतिशत रही है।
यह भी उल्लेखनीय है कि मौजूदा भाव पर वृद्धि दर 17.4 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही में मुख्य रूप से सभी कृषि जिंसों के दाम में बढ़ोतरी हुई है, जिसकी वजह से ऐसा हुआ है। इससे महंगाई दर का असर 12.9 प्रतिशत हो गया है, कभी कभी कुछ अर्थशास्त्री इसका इस्तेमाल किसानों की आय के छद्म आकलन के लिए करते हैं।
लेकिन कृषि उत्पादों की कीमत बढ़ने के साथ कृषि में इस्तेमाल होने वाली सामग्री जैसे उर्वरकों, बीजों आदि के दाम में भी तेजी आई है। इसकी वजह से कृषि उत्पादों की ज्यादा महंगाई दर होने से किसानों को होने वाली आमदनी खत्म हो गई है। अर्थशास्त्रियों को लगता है कि आने वाली शेष तिमाहियों में कृषि एवं संबंधित गतिविधियों में तेज वृद्धि दर बरकरार रख पाना एक चुनौती होगी क्योंकि धान व दलहन की बोआई पिछले साल की तुलना में पीछे चल रही है, जो खरीफ की प्रमुख 2 फसलें हैं। इसकी वजह से फसल क्षेत्र के उपादन पर असर पड़ सकता है।
बैंक आफ बड़ौदा में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, ‘कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी और दाम बढ़िया मिलने की वजह से पहली तिमाही के दौरान ग्रामीण मांग मजबूत थी। शेष तिमाहियों में इस पर धुंध छा जाएगी, अगर प्रमुख फसलों की बोआई कम रहती है।’
उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर अगर कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर शेष तिमाहियों में बेहतर नहीं रहती है तो वित्त वर्ष 23 में जीडीपी वृद्धि गिरकर करीब 7 प्रतिशत पर आ सकती है, जो 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। उन्होंने कहा, ‘मेरी व्यक्तिगत उम्मीद है कि कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर वित्त वर्ष 23 में पूरे साल के दौरान 3.5 से 4 प्रतिशत रहेगी।’
बहरहाल अगर खरीफ की बोआई की स्थिति देखें तो पिछले सप्ताह 26 अगस्त को समाप्त सप्ताह में कृषि मंत्रालय की ओर से जारी हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल की समान अवधि की तुलना में खरीफ फसलों की बोआई 5.9 प्रतिशत कम रही है, जो इसके पहले के सप्ताह में 8.25 प्रतिशत कम थी। पश्चिम बंगाल और झारखंड में बारिश में कुछ तेजी आने से स्थिति सुधरी है।
अगर बोआई के रकबे के हिसाब से देखें तो पिछले साल की तुलना में धान के रकबे में कमी 14 दिन के अंतराल में 15 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत पर आ गई है।
29 जुलाई तक धान की रोपाई सामान्य क्षेत्रफल की तुलना में महज करीब 58.31 प्रतिशत थी, जो 29 अगस्त तक 92.5 प्रतिशत बढ़ा है।
बोआई का सामान्य रकबा पिछले 5 साल का औसत रकबा होता है, जो 397 लाख हेक्टेयर है। बहरहा आंकड़ों से पता चलता है कि 26 अगस्त को समाप्त सप्ताह के दौरान खरीफ की सभी फसलों के रकबे में बढ़ोतरी हुई है और करीब 10.451 लाख हेक्टेयर जमीन खरीफ फसल के तहत लाई गई है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में महज 1.58 प्रतिशत कम है।
धान के रकबे में बढ़ोतरी की एक प्रमुख वजह यह है कि पश्चिम बंगाल और झारखंड में दक्षिण पश्चिमी मॉनसून में थोड़ा बदलाव हुआ है।
पश्चिम बंगाल के गंगा वाले इलाके के बारे में भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि 1 जून से 26 अगस्त के बीच कुल मिलाकर मॉनसूनी बारिश में कमी 2 जून और 29 जुलाई के बीच 46 प्रतिशत से घटकर 27 प्रतिशत रह गई है। इसी तरह झारखंड में समग्र मौसमी कमी 29 जुलाई के 50 प्रतिशत से कम होकर 26 अगस्त तक 27 प्रतिशत रह गई है।
इसी तरह से झारखंड में कुल मिलाकर सीजनल मौसमी बारिश में कमी 29 जुलाई की तुलना में 50 प्रतिशत घटकर कर 36 अगस्त को 26 प्रतिशत हो गई है।