अर्थव्यवस्था

नीति आयोग पुनर्गठन: राजनीति व अर्थशास्त्र का मेल, अशोक लाहिड़ी के कंधों पर केंद्र-राज्य तालमेल की जिम्मेदारी

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता अशोक लाहिड़ी को नीति आयोग के मौजूदा उपाध्यक्ष सुमन बेरी की जगह कमान दी गई है

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ध्रुवाक्ष साहा   
संजीब मुखर्जी   
Last Updated- April 26, 2026 | 10:05 PM IST

देश की सर्वोच्च नीति निर्धारण संस्था नीति आयोग का शीर्ष नेतृत्व शुक्रवार देर रात बदल दिया गया। इस बदलाव के तहत अब संस्था के उपाध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्यों के रूप में नए चेहरे लाए गए हैं। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता अशोक लाहिड़ी को नीति आयोग के मौजूदा उपाध्यक्ष सुमन बेरी की जगह कमान दी गई है।

वर्ष 2015 में योजना आयोग की जगह लेने वाली संस्था नीति आयोग पिछले 11 साल में पहली बार ऐसे बदलाव के दौर से गुजर रहा है जब देश स्वतंत्रता के 100 साल पूरे होने पर अपनी दिशा तय करने के मोड़ पर है,और हाल के इतिहास के सबसे बड़े वैश्विक आर्थिक संकटों में से एक से निपटने के चौराहे पर खड़ा है।

हालांकि, पिछले एक दशक में आयोग में उपाध्यक्ष बदलते रहे हैं मगर यह पहला मौका है जब पूर्णकालिक सदस्यों के रूप में नए चेहरे लाए गए हैं। इस लिहाज से यह कदम अहम हो जाता है।

कृषि अर्थशास्त्री रमेश चंद और वैज्ञानिक वी के सारस्वत स्थापना के समय से ही नीति आयोग से जुड़े रहे थे। अब वे डॉ वीके पॉल और अर्थशास्त्री अरविंद विरमानी के साथ पद छोड़ रहे हैं। 

इनके स्थान पर पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा (एकमात्र सदस्य जिन्हें बरकरार रखा गया है), प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद के अंशकालिक सदस्य केवी राजू, वैज्ञानिक गोवर्द्धन दास, एम्स नई दिल्ली के निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास और विज्ञान सचिव अभय करंदीकर पूर्णकालिक सदस्य नियुक्त किए गए हैं।

यह नया बदलाव आयोग की शासी परिषद की बैठक से पहले हुआ है जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे और जिसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री सदस्य होंगे। नए नेतृत्व से यह अपेक्षा की जाएगी कि वे पश्चिम एशिया के बढ़ते संकट से निपटने, भारत की 2047 

की व्यापक आर्थिक और क्षेत्रवार रणनीति (विकसित भारत@2047) और ​विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को गति देने जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच आम सहमति स्थापित करें।

पश्चिम बंगाल के बालुरघाट से भाजपा के विधायक लाहिड़ी ने मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में विभिन्न दलों के साथ काम किया है और अपने मृदु स्वभाव के कारण केंद्र-राज्य समन्वय में बेहतर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनके साथ पहले काम कर चुके एक अधिकारी ने यह बात कही।

कई लोगों का कहना है कि लाहिड़ी की नियुक्ति नीति में एक नया नजरिया लेकर आई है। 

योजना आयोग के पूर्व सदस्य अरुण मायरा के अनुसार उनके पूर्व सभी उपाध्यक्ष या तो कट्टर सैद्धांतिक अर्थशास्त्री थे या बहुपक्षीय संस्थानों में काम करने का अनुभव रखते थे और प्रशासन में उनका अनुभव न के बराबर था।

मायरा ने कहा,‘लाहिड़ी एक अर्थशास्त्री हैं। यह अलग बात है कि वह पूर्व उपाध्यक्षों जैसा कद नहीं रखते हैं मगर वह सरकार में रह चुके हैं। इसके अलावा, वह विधायक चुने गए थे। वे भारत की वास्तविकताओं और राजनीति से अच्छी तरह वाकिफ हैं।’

केसी पंत के बाद यह दूसरी बार है जब सर्वोच्च योजना निकाय के शीर्ष पर किसी राजनीतिक व्यक्ति की नियुक्ति की गई है। इसके अलावा, यह उन दुर्लभ अवसरों में से एक है जब चुनाव के माध्यम से सत्ता परिवर्तन के बिना सर्वोच्च योजना निकाय का पुनर्गठन किया गया है। आमतौर पर आयोग/आयोग के सदस्यों का कार्यकाल प्रधानमंत्री के कार्यकाल के साथ ही समाप्त होता है।

नीति आयोग की शुरुआत में कड़ी आलोचना हुई थी और इसे एक शक्तिहीन संस्था बताया गया था। योजना आयोग के पूर्व प्रधान आर्थिक सलाहकार एवं भारत के पहले मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन ने कहा,‘राज्यों ने अब तक नीति आयोग को लगभग पूरी तरह से नजरअंदाज किया है।’ उन्होंने कहा कि आयोग का गठन इसलिए किया गया था क्योंकि ऐसा माना जाता था कि योजना आयोग राज्य सरकारों के कार्यों में हस्तक्षेप करता है।

सेन ने कहा,‘नीति आयोग को राज्यों के साथ प्रभावी भूमिका निभाने के लिए उन्हें समझाने-बुझाने की क्षमता होनी चाहिए। यह योजना आयोग से अलग है जहां राज्यों को धन हस्तांतरित करने का निर्णय लिया जाता था। योजना आयोग को लेकर मुख्यमंत्री अधिक गंभीर रहते थे।’

हालांकि, कई लोग इस संस्था की प्रकृति और इसके प्रभाव का बचाव करते हैं। वर्तमान उपाध्यक्ष बेरी ने पहले कहा था कि यह विचार-मंथन संस्था विकेंद्रीकरण की सच्ची भावना का प्रतीक है। पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने भी इस विचार का समर्थन किया था।

 उन्होंने इस अखबार को बताया,‘पांचवीं पंचवर्षीय योजना तक योजना आयोग केवल दस्तावेज तैयार करता था और उसकी वित्तीय भूमिका नगण्य थी। वित्तीय शक्तियों ने वास्तव में उसकी मूल भूमिका छीन ली जिससे राज्यों में काफी असंतोष था।’ उन्होंने आगे कहा कि नीति आयोग ने योजना आयोग के मूल दायित्व को पुनर्जीवित किया और देश के विकास का खाका तैयार किया।

कुमार ने कहा,‘जब मैं नीति आयोग में था तब नीति आयोग का काम एक सच्चे विचारक-तंत्र की तरह था यानी राज्यों के लिए नीतियां तैयार करना और उन्हें भविष्य की संभावनाओं की दिशा में मार्गदर्शन करना। इलेक्ट्रिक वाहन नीति, खनिज अन्वेषण नीति और लघु मॉड्यूलर रिएक्टर रिपोर्ट नीति आयोग में ही तैयार की गई थीं।’

आयोग के पूर्व सदस्य किरीट पारिख ने कहा कि आयोग के सामने प्रमुख चुनौतियों में से एक यह भी है कि उसे न केवल राज्यों में बल्कि केंद्र सरकार में भी गंभीरता से लिया जाए। उन्होंने कहा,‘अक्सर, जब आयोग बैठकें बुलाता है, तो सभी मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी उनमें शामिल नहीं होते। यह एक गंभीर चुनौती है ।’

अधिकारियों का कहना है कि संस्था में गाबा के बढ़ते प्रभाव से केंद्र सरकार में इसका कद बढ़ेगा। पूर्व कैबिनेट सचिव होने के नाते (जिन्हें सरकार के उच्च अधिकारियों का करीबी माना जाता है) मंत्रालय गाबा द्वारा शुरू की गई पहल में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे हैं।

पारिख का यह भी मानना है कि हालांकि, नए नियुक्त सदस्य कभी-कभी संस्था पर अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं और अपने पूर्ववर्तियों के काम को नकार देते हैं मगर नए सदस्यों के आने से नए दृष्टिकोण सामने आते हैं।

योजना आयोग और नीति आयोग दोनों के पूर्व शीर्ष अधिकारियों के बीच यह आम सहमति है कि इस विचार संस्था ने जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा के क्षेत्र में सार्थक काम किया है। पिछले वर्ष आयोग ने अर्थव्यवस्था के 10 प्रमुख क्षेत्रों में विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आवश्यक नीतिगत और राजकोषीय हस्तक्षेपों और मार्ग को रेखांकित करते हुए कई रिपोर्ट जारी कीं।

इसके अलावा इस विचार संस्था ने 22 लाख करोड़ रुपये की राष्ट्रीय मुद्रीकरण योजनाओं (प्रथम और द्वितीय दोनों स्तरों पर) के माध्यम से अवसंरचना में निजी निवेश बढ़ाने की योजना का भी नेतृत्व किया है। इसने राज्य स्तरीय कार्य भी किए हैं, राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक के आधार पर राज्यों को उनकी वित्तीय स्थिति के बारे में सलाह दी है और उनका मूल्यांकन किया है। इसके साथ ही वर्तमान में राज्यों के लिए एक निवेश तत्परता सूचकांक तैयार हो रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि इस पुनर्गठन में हूबहू समान पृष्ठभूमि रखने वाले लोग नहीं लाए गए हैं। अब पैनल में दो वैज्ञानिक (करंदीकर और दास) और एक अर्थशास्त्री (राजू) शामिल हैं। कुमार ने कहा कि यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आयोग स्वयं को विज्ञान और नवाचार के लिए एक शीर्ष निकाय के रूप में स्थापित कर रहा है जो अनुसंधान और विकास तथा अत्याधुनिक तकनीकों जैसे क्षेत्रों में भारत के भविष्य के लिए अच्छा ही है।

इसके अलावा, मायरा ने कहा कि योजना आयोग और नीति आयोग दोनों में ऐसे लोगों की कमी रही है जो उद्योग और श्रम के हितों की वकालत कर सकें और इन दोनों क्षेत्रों में काम करने के अनुभव के आधार पर इन दोनों क्षेत्रों का गहन ज्ञान रखते हों।

मायरा ने कहा,‘रोजगार दो पहलुओं वाला विषय है। इसमें सफल और विकसित उद्योगों का निर्माण करना शामिल है जो लोगों को रोजगार प्रदान करें। साथ ही, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि लोग अच्छी तरह प्रशिक्षित हों और उद्योग के साथ मिलकर काम करें। ये अलग-अलग विषय नहीं हैं इसलिए उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं देखा जा सकता।’ 

First Published : April 26, 2026 | 10:04 PM IST