नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की राज्यों के वित्त की तीसरी वार्षिक समीक्षा में कहा गया है कि 2024-25 में भारत के 28 राज्यों में से 18 राज्यों ने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 3 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे की सीमा को पार कर लिया है। सीएजी ने पाया कि यह गिरावट कोविड के असर वाले वित्त वर्ष 2020-21 में देखी गई राजकोषीय घाटे में वृद्धि के बराबर है।
रिपोर्ट के मुताबिक मेघालय का राजकोषीय घाटा उसके जीएसडीपी का 8.69 प्रतिशत रहा है, जो सर्वाधिक है। इसके बाद नगालैंड का 6.14 प्रतिशत और सिक्किम का राजकोषीय घाटा 5.59 प्रतिशत रहा। इसके अलावा, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और ओडिशा सहित 14 राज्यों का राजकोषीय घाटा 2023-24 की तुलना में 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। इसके अलावा 2024-25 में 15 राज्य राजस्व घाटे में थे और संयुक्त घाटा 3.46 लाख करोड़ रुपये था।
सीएजी के 2015-16 से 2024-25 तक के 10 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि सभी राज्यों की संयुक्त रूप से कुल देनदारी 31.20 लाख करोड़ रुपये से 190 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 90.51 लाख करोड़ रुपये हो गई। जीएसडीपी में इसकी हिस्सेदारी के हिसाब से देखें तो यह 24.19 प्रतिशत से बढ़कर 27.89 प्रतिशत हो गया है। ईवाई इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार डीके श्रीवास्तव ने कहा कि राज्यों की कुल मिलाकर देनदारी उनकी जीएसडीपी का 27.89 प्रतिशत है, जो नॉमिनल जीडीपी का 28.5 प्रतिशत है। वहीं यह केंद्र के मामले में जीडीपी का 55.4 प्रतिशत है।
श्रीवास्तव ने बताया कि यदि एफआरबीएम 2018 के मानदंडों के मुकाबले आकलन किया जाए तो केंद्र और राज्य दोनों अपने ऋण लक्ष्यों को पार कर रहे हैं, जो जीडीपी का क्रमशः 40 प्रतिशत और 20 प्रतिशत है। उन्होंने कहा, ‘अगर ऋण के स्तर का मूल्यांकन बारहवें वित्त आयोग द्वारा दिए गए 28 प्रतिशत जीडीपी प्रत्येक के स्थायी मानदंडों के हिसाब से किया जाता है, तो एक समूह के हिसाब से राज्यों की स्थिति काफी बेहतर दिखाई देती है, जबकि भारत सरकार को अभी भी कोविड के बाद के तनाव से उबरना है।’
सीएजी ने पाया, ‘सार्वजनिक ऋण तीन गुना से अधिक बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में संयुक्त जीएसडीपी का 23 प्रतिशत हो गया है। इसमें कई राज्यों ने पूंजी निर्माण के बजाय राजस्व व्यय की भरपाई करने के लिए तेजी से ऋण लिया है।’ पंद्रहवें वित्त आयोग द्वारा इंगित जीएसडीपी के 32.8 प्रतिशत की सीमा को 13 राज्यों ने पार कर लिया है।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा राज्यों की प्राप्तियों और भुगतानों के बीच अल्पकालिक असंतुलन को प्रबंधित करने में मदद के लिए प्रदान की जाने वाली अस्थायी अग्रिम वेज ऐंड मीन्स एडवांसेज (डब्ल्यूएमए) 2015-16 के 74,832 करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 में 3.31 लाख करोड़ रुपये और फिर 2024-25 में 6.87 लाख करोड़ रुपये हो गया है। सीएजी ने कहा है, ‘लगातार चल रहे वित्तीय दबाव, राज्य के बजट के भीतर लचीलेपन में कमी और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कई राज्यों में विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन प्रथाओं की जरूरत की ओर इशारा करती है।’