केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज बड़ी कंपनियों से कहा कि वे सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के बकाये का भुगतान करें। उन्होंने कहा कि छोटे कारोबार को सरकार के साथ ही बड़ी स्थापित फर्मों से बराबर सहयोग की जरूरत है। हीरो माइंडमाइन सम्मेलन में केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा, ‘एमएसएमई को समर्थन केवल वह नहीं है, जो सरकार दे सकती है। यह निश्चित रूप से उन पर निर्भर हैं। केंद्र व राज्य सरकारों व केंद्रीय व राज्य सरकारों की इकाइयों का भुगतान लंबित है। लेकिन मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि बड़े उद्योगों का भी बड़े पैमाने पर बकाया है।’
सीतारमण ने कहा कि वह सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (पीएसयू) और विभागों पर दबाव डाल सकती हैं और राज्यों से भुगतान का अनुरोध कर सकती हैं, साथ ही उन्होंने कहा, ‘मैं उद्योग जगत से केवल अपील कर सकती हूं। हम एमएसएमई के लिए जितना आंसू बहाते हैं, क्या हम उनका बकाया भुगतान कर आंसू कम कर सकते हैं?’
सीतारमण ने कहा कि यह उत्साहजनक है कि बड़ी कंपनियों ने वह राशि अपने सालाना लेखा जोखा में शामिल की है, जिसे एमएसएमई को देना है, लेकिन उन्होंने कहा कि उनका बकाया निपटाने की जरूरत है। खबरों के मुताबिक भारत के एमएसएमई का 2021 के अंत तक 10.7 लाख करोड़ रुपये बकाया है। निजी ग्राहकों, सरकारी विभागों और पीएसयू की ओर से भुगतान में देरी हो रही है। इसमें से सूक्ष्म और लघु उद्यमों का बकाया 8.73 लाख करोड़ रुपये या कुल बकाया राशि का 80 प्रतिशत है। सूक्ष्म उद्योग इसकी वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और उनके 65.73 प्रतिशत भुगतान देरी से हो रही है।
सीतारमण ने कहा कि जनता की एक आम धारणा है कि यह पूरा बकाया सरकार का है, इस धारणा को दुरुस्त किए जाने की जरूरत है। भारत में एमएसएमई क्षेत्र को अधिकतम 45 दिन में भुगतान कर देने की सिफारिश की गई है। बहरहाल 2020-21 में सूक्ष्म उद्योगों के मामले में यह 195 दिन रहा है।
सरकार ने एमएसएमई समाधान नाम से पोर्टल बनाया है, जिससे एमएसएमई के बकाये का भुगतान हो सके। इस वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक बकाया भुगतान न किए जाने के 19,499 करोड़ रुपये के मामले दर्ज किए गए और 4,859 करोड़ रुपये के मामलों का निपटान किया गया है।
अन्य मसलों पर बात करते हुए सीतारमण ने यह भी कहा कि तमाम देशों ने रिजर्व बैंक द्वारा हाल में की गई व्यवस्था के बाद रुपये में द्विपक्षीय कारोबार करने की दिलचस्पी दिखाई है। उन्होंने कहा, ‘यह सिर्फ रुपये-रूबल में कारोबार तक सीमित नहीं है, जैसा कि पुराने प्रारूप में था। अब यह रुपये में द्विपक्षीय कारोबार का तरीका है। मुझे खुशी है कि इतने अहम दौर में रिजर्व बैंक ने यह व्यवस्था पेश की है।’
उन्होंने कहा, ‘महामारी के बाद भारत कई तरह के नए समाधान पेश कर रहा है। मैं इस तथ्य का उल्लेख करना चाहूंगी कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था ज्यादा खुली है, हम ज्यादा खुले रूप में देशों से बात कर रहे हैं, हम अपना डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने को इच्छुक हैं, जिससे देशों के बीच कारोबार हो सके और सीमा के पार लेन देन संभव हो सके।’
सीतारमण ने उद्योग जगत के प्रमुखों से यह भी कहा कि वह ऐसे समय विनिर्माण क्षेत्र में निवेश से क्यों हिचकिचा रहे हैं, जब विदेशी निवेशकों ने भारत में बहुत ज्यादा भरोसा दिखाया है। हनुमान और भारत के उद्योग जगत की तुलना करते हुए सीतारमण ने कहा, ‘मैं भारतीय उद्योग से जानना चाहती हूं कि उनमें निवेश को लेकर हिचकिचाहट क्यों है।’
सीतारमण ने कहा, ‘क्या यह हनुमान जैसा मामला है? आप अपनी खुद की क्षमता, अपनी ताकत पर भरोसा नहीं रखते, आपके पास खड़े किसी दूसरे व्यक्ति को कहना पड़ेगा कि आप हनुमान हैं, आप ऐसा करें? वह कौन व्यक्ति है, जो आपको हनुमान कहने जा रहा है? निश्चित रूप से वह सरकार नहीं हो सकती।’शाम को दिल्ली स्कूल आफ इकनॉमिक्स क एक और कार्यक्रम में सीतारमण ने इस बात पर जोर दिया कि ‘मुफ्त वितरण’ के मसले पर अभी और चर्चा करने की जरूरत है।