भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरने का निर्यात के लिए मिला-जुला मतलब हो सकता है। विशेषज्ञों और उद्योग ने अधिकारियों ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि घरेलू मुद्रा में गिरावट से निर्यातकों का लाभ कुछ कम हो सकता है।
उन्होंने कहा कि रुपये का अवमूल्यन यदि जारी रहा तो, निश्चित रूप से यह निर्यात के लिए फायदेमंद होगा। मगर, भारतीय अर्थव्यवस्था कम आयात पर निर्भर रहती तो यह लाभ बहुत अधिक होता। इसका मतलब हुआ कि अगर घरेलू मुद्रा डॉलर के मुकाबले गिरती रहती है तो उन उत्पादों के निर्यातक जो आयातित कच्चे माल पर निर्भर नहीं होते हैं वे मुनाफा कमा सकते हैं।
दूसरी ओर, निर्यात के लिए उच्च इनपुट लागत भारत के निर्यात को वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पर्धी बना सकती है। नतीजतन, पेट्रोलियम, रत्न व आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में उत्पादों को ज्यादा फायदा नहीं होगा क्योंकि वे आयात पर निर्भर हैं। साथ ही अगर रुपया बहुत अधिक गिरता है तो आयातित मुद्रास्फीति का खतरा भी हमेशा बना रहेगा। उद्योग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘यह चुनौतीभर समय है और इससे भारत के निर्यात पर मिश्रित प्रभाव पड़ेगा। मुख्य रूप से निर्यातक एक स्थिर मुद्रा चाहते हैं।
इसलिए, अगर आरबीआई रुपया को 79-81 रुपया प्रति डॉलर के स्तर पर कुछ समय के लिए बनाकर रखता है, तो कम से कम कुछ समय के लिए निश्चितता रहेगी। स्थिर मुद्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि निर्यातक को यह नहीं पता होता है कि किस कीमत पर अपना ऑर्डर देना है।’उद्योग लॉबी समूह पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष प्रदीप मुल्तानी कहते हैं, ‘रुपया में अत्यधिक उतार-चढ़ाव न तो निर्यातकों के पक्ष में है और न ही आयातकों के लिए फायदेमंद। इसलिए व्यापार से फायदा लेने के लिए रुपया निश्चित रूप से स्थिर स्तर पर होना चाहिए।’
उच्च मुद्रास्फीति से निपटने के उपाय के रूप में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर में वृद्धि के बाद पिछले सत्र में 79.975 की तुलना में भारतीय रुपया डॉलर के रिकॉर्ड 80.86 के निचले स्तर पर बंद हुआ। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, 24 फरवरी के बाद यह एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट थी।