वित्त मंत्रालय के अधिकारी विभिन्न विभागों और मंत्रालयों के साथ सोमवार से बजट-पूर्व बैठकों का दौर शुरू करेंगे। मंत्रालय के अधिकारियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उन क्षेत्रों की पहचान करने की होगी जिनमें गैर-जरूरी खर्चों में कटौती की जा सके ताकि वित्त वर्ष 2023 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल किया जा सके। सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.4 फीसदी रखा है।
सूत्रों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर राजस्व इस साल बेहतर रहा है लेकिन यह खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी के बढ़े हुए खर्च की भरपाई करने के लिए शायद पर्याप्त नहीं होगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘हमारी शीर्ष प्राथमिकता राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 6.4 तक सीमित करना है। राजस्व प्रवाह अतिरिक्त खर्च की भरपाई के पर्याप्त नहीं हो सकता है, इसलिए हमें गैर-प्राथमिकता वाले खर्च में कटौती के उपाय तलाशने होंगे या उन क्षेत्रों में खर्च घटाना होगा जो ज्यादा जरूरी नहीं हैं।’
अधिकारी ने स्पष्ट किया कि पूंजीगत व्यय में कोई बदलाव नहीं होगा, वहीं सब्सिडी, कल्याण और प्रमुख योजनाओं पर भी खर्च में कटौती नहीं की जा सकती है। उक्त अधिकारी ने कहा, ‘खर्च को लेकर दबाव है। पूंजीगत व्यय और
अधिकांश राजस्व व्यय की प्रतिबद्धता जताई जा चुकी है। इसलिए खर्च में कटौती को लेकर निर्णय करना कठिन होगा। इसलिए संशोधित अनुमान को हासिल करने पर ध्यान दिया जाएगा।’
10 अक्टूबर से 10 नवंबर तक व्यय एवं आर्थिक मामलों के विभाग के अधिकारी केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों, एजेंसियों और विभागों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करेंगे। इस बैठक का मकसद वित्त वर्ष 2023 के लिए संशोधित अनुमान तय करना और वित्त वर्ष 2024 के लिए बजट अनुमान आवंटित करना है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण उद्योग संगठनों, कृषि, सामाजिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों और अर्थशास्त्रियों के साथ नवंबर मध्य से बैठक कर सकती हैं।
उक्त अधिकारी ने बताया कि विभिन्न विभागों से अतार्किक खर्च बंद करने के लिए कहा गया है। उपभोक्ता मामलों, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय से कहा गया कि खाद्य गारंटी योजनाओं के लिए खाद्यान्न खरीदने के लिए खरीद की लागत की गणना किस तरह से की जाती है, उस पर ध्यान दिया जाए।
उक्त अधिकारी ने कहा कि अभी तक खाद्य सब्सिडी मद में जितनी राशि मांगी जाती थी, वह दे दी जाती थी। लेकिन अब इस तरह की व्यवस्था जारी नहीं रहेगी और उनसे कहा गया है कि खाद्यान्न खरीद की लागत उचित और तार्किक होनी चाहिए। इस साल यूरोप में युद्ध और भू-राजनीतिक संकट की वजह से खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी पर बड़ा खर्च हुआ है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को कई बार बढ़ाए जाने से चालू वित्त वर्ष में खाद्य सब्सिडी बढ़कर 3.32 लाख करोड़ रुपये हो सकती है जबकि बजट में 2.07 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था। उर्वरक सब्सिडी बढ़कर 2.5 लाख करोड़ रुपये हो सकती है जबकि बजट में इसके 1.05 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था।