Indian State Capex: देश के विकास की रफ्तार को लेकर एक अहम और थोड़ी चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। SBI रिसर्च की ताजा रिपोर्ट कहती है कि केंद्र सरकार लगातार राज्यों को पैसा दे रही है, लेकिन कई राज्य उस पैसे का पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे। हालात ऐसे हैं कि अगर राज्य खुद आगे बढ़कर खर्च नहीं बढ़ाते, तो विकास की रफ्तार अधूरी ही रह जाएगी। रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि सिर्फ केंद्र की मदद से काम नहीं चलेगा, राज्यों को भी जेब ढीली करनी होगी, तभी असली असर दिखेगा।
पिछले 5 साल में केंद्र सरकार ने SASCI योजना के तहत राज्यों को करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये दिए। इससे राज्यों का पूंजीगत खर्च जरूर बढ़ा और अर्थव्यवस्था को सहारा मिला। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। पहले जहां लगभग सभी राज्य इस फंड का पूरा इस्तेमाल कर रहे थे, वहीं अब कई राज्यों के बीच फर्क साफ नजर आने लगा है। कहीं पैसा सही से लग रहा है, तो कहीं काम अटक रहा है।
राज्यवार SASCI उपयोग दर (प्रतिशत में)
| राज्य | 2020-21 | 2021-22 | 2022-23 | 2023-24 | 2024-25 |
|---|---|---|---|---|---|
| आंध्र प्रदेश | 100.0% | 100.0% | 97.0% | 93.9% | 81.5% |
| अरुणाचल प्रदेश | 46.4% | 100.0% | 86.4% | 83.2% | 76.9% |
| असम | 100.0% | 100.0% | 86.7% | 71.6% | 80.9% |
| बिहार | 100.0% | 77.1% | 91.7% | 78.7% | 74.4% |
| छत्तीसगढ़ | 100.0% | 100.0% | 63.0% | 90.9% | 94.4% |
| गोवा | 100.0% | 100.0% | 100.0% | 68.6% | 77.8% |
| गुजरात | 100.0% | 66.7% | 89.5% | 87.8% | 89.8% |
| हरियाणा | 100.0% | 66.7% | 96.2% | 90.6% | 82.4% |
| झारखंड | 41.0% | 39.9% | 80.0% | 83.0% | 66.7% |
| कर्नाटक | 100.0% | 100.0% | 95.4% | 77.2% | 92.4% |
| केरल | 50.0% | 100.0% | 48.9% | 71.2% | 69.7% |
| मध्य प्रदेश | 100.0% | 98.7% | 99.3% | 97.4% | 94.3% |
| महाराष्ट्र | 100.0% | 92.4% | 85.8% | 80.8% | 95.0% |
| मणिपुर | 76.2% | 96.3% | 44.7% | 35.7% | 47.4% |
| मेघालय | 90.6% | 100.0% | 87.8% | 78.4% | 85.8% |
| मिजोरम | 100.0% | 100.0% | 59.8% | 57.2% | 79.3% |
| नागालैंड | 100.0% | 100.0% | 100.0% | 80.8% | 51.7% |
| ओडिशा | 90.7% | 87.1% | 100.0% | 63.7% | 90.6% |
| पंजाब | 100.0% | 60.6% | 32.9% | 6.5% | 84.3% |
| राजस्थान | 94.6% | 92.7% | 99.5% | 91.8% | 93.4% |
| सिक्किम | 100.0% | 100.0% | 100.0% | 84.7% | 84.6% |
| तमिलनाडु | 100.0% | 100.0% | 95.4% | 85.7% | 79.3% |
| तेलंगाना | 86.9% | 100.0% | 84.9% | 71.7% | 57.5% |
| त्रिपुरा | 67.2% | 77.8% | 38.8% | 73.8% | 86.6% |
| उत्तर प्रदेश | 100.0% | 36.9% | 54.5% | 86.7% | 87.9% |
| उत्तराखंड | 84.6% | 75.4% | 95.8% | 88.5% | 71.6% |
| पश्चिम बंगाल | 100.0% | 96.2% | 54.6% | 66.7% | 96.7% |
स्रोत: लोकसभा प्रश्न, SBI रिसर्च
रिपोर्ट में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि जिन राज्यों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है, वहां विकास से जुड़ा खर्च करना मुश्किल हो जाता है। आसान भाषा में समझें तो इन राज्यों की कमाई का बड़ा हिस्सा पहले से लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाने और पुराने खर्चों को संभालने में ही निकल जाता है। ऐसे में उनके पास नए प्रोजेक्ट्स, सड़क, पुल, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कामों पर खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा बचता ही नहीं।
पंजाब, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट कहती है कि इन राज्यों का कर्ज जीडीपी के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसका सीधा असर यह होता है कि सरकार को अपने बजट का बड़ा हिस्सा वेतन, सब्सिडी, पेंशन और ब्याज चुकाने में लगाना पड़ता है। इसे ही राजस्व खर्च कहा जाता है। जब राजस्व खर्च बढ़ जाता है, तो पूंजीगत खर्च यानी कैपेक्स के लिए जगह कम बचती है।
इसका दूसरा असर यह होता है कि ऐसे राज्य केंद्र से मिलने वाली SASCI जैसी योजनाओं का पैसा भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाते। क्योंकि सिर्फ पैसा मिलना ही काफी नहीं होता, उसे जमीन पर प्रोजेक्ट में बदलने के लिए प्रशासनिक क्षमता और अतिरिक्त फंड भी चाहिए होता है। कर्ज में दबे राज्यों के पास यह क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई है कि जिन राज्यों में युवा आबादी ज्यादा है, वहां इस योजना का इस्तेमाल बेहतर हुआ है। वहीं जिन राज्यों में बुजुर्ग आबादी ज्यादा है, वहां खर्च कम दिखा। हालांकि हर राज्य की अपनी स्थिति भी मायने रखती है, इसलिए एक ही कैटेगरी में भी फर्क देखने को मिलता है।
रिपोर्ट में एक और अहम बात सामने आई है, जो थोड़ा चिंता बढ़ाने वाली है। कई राज्य अब लोगों को सीधे पैसा देने वाली योजनाओं पर तेजी से खर्च बढ़ा रहे हैं। झारखंड, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य इसमें सबसे आगे हैं। यानी सरकारें लोगों के खाते में सीधे पैसे डाल रही हैं या ऐसी स्कीम चला रही हैं जिनका सीधा फायदा जनता को मिलता है।
लेकिन यहां एक बड़ी दिक्कत भी है। जब सरकार का ज्यादा पैसा इन योजनाओं में चला जाता है, तो विकास के कामों के लिए फंड कम पड़ने लगता है। सड़क, पुल, बिजली, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जो पैसा लगना चाहिए, वह धीरे-धीरे कम हो जाता है।
रिपोर्ट यह भी इशारा करती है कि ऐसे राज्यों में एक तरह से “बदलाव” हो रहा है। यानी जहां राज्य को अपने पैसे से निवेश करना चाहिए, वहां वह केंद्र से मिलने वाले फंड का ज्यादा इस्तेमाल करने लगता है। आसान भाषा में कहें तो राज्य अपना पैसा बचाता है और केंद्र के पैसे से काम चलाने की कोशिश करता है।
SBI रिसर्च इस मुद्दे पर बहुत साफ बात कहता है कि सिर्फ केंद्र का पैसा काफी नहीं है, असली खेल तब शुरू होता है जब राज्य भी इसमें अपना पैसा जोड़ते हैं। अभी जो हो रहा है, उसमें केंद्र पैसा दे रहा है लेकिन कई राज्य उतना अपना योगदान नहीं बढ़ा रहे, जिससे इसका पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर राज्य कम से कम 30 प्रतिशत तक अपना पैसा भी इन प्रोजेक्ट्स में लगाएं, तो इसका असर जमीन पर साफ दिखने लगता है। यानी सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर और बाकी विकास के काम तेजी से आगे बढ़ते हैं और अर्थव्यवस्था को भी ज्यादा मजबूती मिलती है।
और अगर राज्य पूरी तरह से बराबर का योगदान करने लगें, यानी जितना केंद्र दे रहा है उतना ही खुद भी निवेश करें, तो इसका असर कई गुना बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी साफ कहा गया है कि जिस पैसे को किसी खास काम से जोड़ दिया जाता है, उसका इस्तेमाल ज्यादा सही और असरदार तरीके से होता है। जैसे अगर फंड साफ तौर पर शहरों के विकास, सड़क या इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए दिया गया है, तो राज्यों के पास उसे उसी काम में लगाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं होता। इससे यह तय हो जाता है कि पैसा सीधे विकास वाले काम में ही लगेगा और उसका असर जमीन पर दिखेगा।
वहीं दूसरी तरफ, जो फंड बिना किसी शर्त के दिए जाते हैं, उनमें समस्या शुरू होती है। ऐसे फंड का इस्तेमाल राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से कहीं भी कर सकते हैं। कई बार यह पैसा जरूरी प्रोजेक्ट्स की बजाय दूसरे खर्चों में चला जाता है, जैसे पुराने बिल चुकाने या दूसरी योजनाओं में।
कुल मिलाकर, केंद्र सरकार अपना काम कर रही है, लेकिन अब बारी राज्यों की है। अगर राज्य खुद आगे बढ़कर निवेश नहीं बढ़ाते, तो विकास की कहानी अधूरी रह सकती है। अब देखना यह है कि राज्य इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं।