अर्थव्यवस्था

अब सिर्फ डॉलर नहीं, कई करेंसी पर चल सकती है ग्लोबल अर्थव्यवस्था

अब वैश्वीकरण की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और दुनिया ज्यादा राष्ट्रवादी आर्थिक मॉडल की तरफ बढ़ सकती है

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देवव्रत वाजपेयी   
Last Updated- May 11, 2026 | 9:36 AM IST

दुनिया इस समय सिर्फ आर्थिक उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अमेरिका की अगुवाई वाला मौजूदा वैश्विक आर्थिक मॉडल कमजोर पड़ता दिख रहा है और आने वाले समय में देशों का फोकस फिर से अपने उद्योग, सप्लाई चेन और घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर हो सकता है। नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अब वैश्वीकरण की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और दुनिया ज्यादा राष्ट्रवादी आर्थिक मॉडल की तरफ बढ़ सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक पहले अमेरिका दुनिया में मुक्त व्यापार, खुले बाजार और वैश्विक पूंजी निवेश का सबसे बड़ा समर्थक था, लेकिन अब वही व्यवस्था दबाव में है। बढ़ती आर्थिक असमानता, राजनीतिक तनाव और भू-राजनीतिक संघर्षों ने कई देशों को अपने घरेलू उद्योगों और राष्ट्रीय हितों पर दोबारा जोर देने के लिए मजबूर कर दिया है।

अब बदल सकती है दुनिया की आर्थिक सोच

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ दशकों में वैश्वीकरण तेजी से बढ़ा, लेकिन इसका फायदा सभी देशों और लोगों तक बराबरी से नहीं पहुंचा। इससे अमीर और गरीब के बीच की दूरी बढ़ी। अब सरकारें घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने और रोजगार बढ़ाने के लिए ज्यादा दखल दे सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार आने वाले समय में वित्तीय बाजारों और विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम हो सकती है। कई देश अपनी अर्थव्यवस्था और उद्योगों की सुरक्षा के लिए पूंजी फ्लो पर ज्यादा नियंत्रण लगा सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां बार-बार देखने को मिल सकती हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री रास्तों पर तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती हैं। इससे कंपनियों और सरकारों को नई रणनीति बनानी पड़ेगी।

एआई बढ़ा सकता है आय में असमानता

रिपोर्ट के मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल से आय और रोजगार में असमानता बढ़ सकती है। इससे सरकारों पर गरीब और मध्यम वर्ग को राहत देने के लिए नई सामाजिक योजनाएं लाने का दबाव बढ़ सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में डॉलर का दबदबा धीरे-धीरे कम हो सकता है और दुनिया कई बड़ी मुद्राओं पर आधारित नई वैश्विक व्यवस्था की तरफ बढ़ सकती है।

भारत को मैन्युफैक्चरिंग पर बढ़ाना होगा फोकस

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत लंबे समय से सेवा क्षेत्र पर ज्यादा निर्भर रहा है, जबकि चीन ने अपने विनिर्माण और औद्योगिक ढांचे को मजबूत किया। केवल सेवा क्षेत्र के भरोसे बड़े पैमाने पर रोजगार और मजबूत अर्थव्यवस्था तैयार करना मुश्किल हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत को अब फैक्टरी, मैन्युफैक्चरिंग और जरूरी सप्लाई चेन मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देना होगा। सरकार को उत्पादन बढ़ाने वाली योजनाओं का दायरा बढ़ाना पड़ सकता है ताकि देश आयात पर कम निर्भर हो और घरेलू उद्योग मजबूत बनें। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आने वाला दौर पूरी तरह मुक्त बाजार के बजाय औद्योगिक उत्पादन, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी हस्तक्षेप पर ज्यादा आधारित हो सकता है।

First Published : May 11, 2026 | 9:24 AM IST