वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल | फाइल फोटो
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण व्यापार और लॉजिस्टिक्स में जारी व्यवधान के मद्देनजर सरकार निर्यात-आयात तंत्र पर साप्ताहिक आधार पर नजर रखने के लिए ‘क्षेत्र-वार तनाव संकेतक’ और ढांचागत निगरानी तंत्र स्थापित करेगी।
भारत के व्यापार व निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करने वाली लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग व शिपिंग संबंधी उभरती चुनौतियों के समाधान के लिए उच्च स्तरीय हितधारकों का गुरुवार को परामर्श आयोजित हुआ। इस क्रम में दो महत्वपूर्ण बैठकें हुईं – एक बैठक की अध्यक्षता वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने की और दूसरी की सह-अध्यक्षता जहाजरानी सचिव विजय कुमार ने की।
बैठकों के दौरान उद्योग जगत ने आपूर्ति श्रृंखला और लॉजिस्टिक्स चुनौतियों के साथ-साथ बढ़ती लागत पर भी चिंता जताई। इनका सामना आमतौर पर प्रमुख जोखिम वाले क्षेत्र जैसे परिधान, चमड़ा, ऑप्टिकल फाइबर और मेडिकल डिवाइस कर रहे हैं। उन्होंने एलएनजी, हीलियम और पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव जैसे महत्त्वपूर्ण इनपुट की निरंतर उपलब्धता के साथ-साथ माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के रिफंड को शीघ्र मुहैया कराने की मांग की। इससे नकदी की स्थिति बेहतर होगी।
अग्रवाल ने घरेलू उत्पादन क्षमता का आकलन करने और आयात पर निर्भरता की पहचान करने सहित प्रमुख पैकेजिंग इनपुट के समयबद्ध मूल्यांकन की जरूरत पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि उभरती चुनौतियों की पहचान करने और समय पर हस्तक्षेप को सुविधाजनक बनाने के लिए उद्योग और निर्यात संवर्धन परिषदों के साथ नियमित परामर्श जारी रहेगा।
वाणिज्य विभाग ने शुक्रवार को बयान में कहा, ‘वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में पैकेजिंग सामग्री और संबंधित इनपुट में व्यवधान से उत्पन्न चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। यह देखा गया कि मौजूदा दौर में जारी भू-राजनीतिक घटनाक्रम से पॉलिमर व रेजिन जैसे प्रमुख पेट्रोकेमिकल इनपुट की उपलब्धता व कीमतें प्रभावित हो सकती हैं। इससे सभी क्षेत्रों में पैकेजिंग सामग्री की लागत बढ़ सकती है।’
जहाजरानी सचिव ने दस्तावेजीकरण प्रक्रियाओं, वापस शहर में आने वाले और पारगमन माल से संबंधित मामलों, जहाजरानी लाइनों को मिलने वाले लाभों, हवाई माल ढुलाई लागत, रेलवे रियायतों और बंकर ईंधन की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर चर्चा की।