प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने पिछले वित्त वर्ष में टैक्स विवादों को सुलझाने में बड़ी तेजी दिखाई है। डिपार्टमेंट ने कुल 2,22,540 अपीलों का निपटारा किया, जो पिछले साल की तुलना में करीब 29 प्रतिशत ज्यादा है। पिछले फिस्कल (2024-25) में यह संख्या 1,72,361 रही थी।
CBDT चेयरमैन रवि अग्रवाल ने 9 अप्रैल को डिपार्टमेंट के अधिकारियों को लिखे एक पत्र में कर्मचारियों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि पिछले साल टीम ने अच्छा काम किया है और अब नए वित्त वर्ष (2026-27) में काम डेटा के आधार पर, संतुलित तरीके से और एक साफ-सुथरे व प्रभावी टैक्स सिस्टम बनाने के मकसद से होना चाहिए।
चेयरमैन ने पत्र में बताया कि साल की शुरुआत में 1,51,239 पुरानी (लेगेसी) अपीलें लंबित थीं। इनमें से 50,654 मामलों को एक खास अभियान चलाकर निपटाया गया, जिससे लंबित पुरानी अपीलों में 33.49% की कमी आई। उन्होंने कहा कि इससे टैक्सपेयर्स को सिस्टम में ज्यादा भरोसा और स्पष्टता मिलेगी।
अधिकारियों के मुताबिक, डिपार्टमेंट अब डेटा एनालिटिक्स और इंटेलिजेंस का इस्तेमाल पहले से ज्यादा कर रहा है। इन्हीं के जरिए जोखिम की पहचान की जा रही है और उसी हिसाब से कार्रवाई हो रही है। खास तौर पर देशभर में कुछ थीम-आधारित जांच भी की गईं, जिनमें गलत डिडक्शन क्लेम और बिजनेस आय छिपाने जैसे मामलों पर फोकस रहा।
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पिछले साल डिपार्टमेंट ने 72,933 शिकायतें निपटाईं और औसतन हर शिकायत को सुलझाने में 47 दिन लगे। इसके अलावा 1,32,125 रेक्टिफिकेशन एप्लिकेशन प्रोसेस किए गए और 5,68,621 ऑर्डर्स गिविंग इफेक्ट OGEs जारी हुए। इन सबको मिलाकर कुल 10.26 लाख से ज्यादा मामले निपटाए गए, जिससे 12,33,469 करोड़ रुपये की बकाया डिमांड कम हुई।
ट्रस्ट और चैरिटेबल संस्थाओं के लिए भी राहत की बात है, पिछले वित्त वर्ष में करीब 1.56 लाख ट्रस्टों को रजिस्ट्रेशन या री-रजिस्ट्रेशन मिला और कई संस्थाओं के पुराने पेपर रिकॉर्ड को डिजिटल सिस्टम में शिफ्ट किया गया, ताकि प्रक्रिया आसान और ज्यादा पारदर्शी हो सके।
ट्रांसफर प्राइसिंग में स्पष्टता लाने के लिए डिपार्टमेंट ने 219 एडवांस्ड प्राइसिंग एग्रीमेंट्स APAs साइन किए, जो पिछले साल के 174 एग्रीमेंट्स के मुकाबले 25.86 प्रतिशत ज्यादा हैं। चेयरमैन ने यह भी कहा कि साल 2026 डिपार्टमेंट के लिए अहम है, क्योंकि नया इनकम टैक्स एक्ट 2025 और इनकम टैक्स रूल्स 2026 लागू हो चुके हैं।
इन बदलावों से टैक्सपेयर्स के लिए नियमों का पालन करना आसान होगा और टैक्स सिस्टम ज्यादा डेटा-आधारित और बिना अनावश्यक दखल वाला बनेगा। कुल मिलाकर डिपार्टमेंट का ध्यान विवाद कम करने, डेटा का बेहतर इस्तेमाल करने और टैक्सपेयर्स के साथ निष्पक्ष व्यवहार सुनिश्चित करने पर है।