यूरोप में युद्ध के कारण महंगाई के दबाव के बावजूद अप्रैल-जून तिमाही में भारत में परिवारों की खपत और पूंजीगत निवेश के आकड़ों में मजबूत सुधार नजर आ रहा है। बहरहाल जीडीपी के प्रतिशत के हिसाब से सरकार की खपत कम हुई है।
वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही में परिवार और निजी क्षेत्र की खपत 39.7 लाख करोड़ रही है, जिसे निजी अंतिम खपत व्यय (पीएफसीई) द्वारा मापा जाता है। इसकी तुलना में पिछले साल की समान अवधि में यह 28.4 लाख करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 22 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में 39.2 लाख करोड़ रुपये था।
नॉमिनल जीडीपी के प्रतिशत के हिसाब से पीएफसीई 61.1 प्रतिशत था, जो वित्त वर्ष 22 की पहली तिमाही में 55.5 प्रतिशत औऱ वित्त वर्ष 22 की चौथी तिमाही में 59.2 प्रतिशत था।
नॉमिनल सकल नियत पूंजी सृजन (जीएफसीएफ), जो निवेश का रूपक होता है, वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही में 19 लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 22 की पहली तिमाही में 14.4 लाख करोड़ रुपये था। बहरहाल यह वित्त वर्ष 22 की चौथी तिमाही के 20.2 लाख करोड़ रुपये की तुलना में थोड़ा कम है। इससे पता चलता है कि सरकार के पूंजीगत व्यय पर जोर देने से निजी क्षेत्र से निवेश भी बढ़ा है। निवेश कुछ हद तक महंगाई दर और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से प्रभावित रहा है। इसका कंपनियों के बही खाते पर असर पड़ा।
नॉमिनल जीडीपी के प्रतिशत अंशदाता के रूप में जीएएफसीएफ वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही में 29.2 प्रतिशत, वित्त वर्ष 22 की पहली तिमाही में 28.2 प्रतिशत, और वित्त वर्ष 22 की चौथी तिमाही में 30.5 प्रतिशत रहा है।
सरकार का अंतिम खपत व्यय (जीएफसीई) वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही में 7.3 लाख करोड़ रुपये (नॉमिनल जीडीपी का 11.3 प्रतिशत), वित्त वर्ष 22 की पहली तिमाही में 6.6 लाख करोड़ रुपये (12.9 प्रतिशत) और वित्त वर्ष 22 की चौथी तिमाही में 7.8 लाख करोड़ रुपये (11.9 प्रतिशत) रहा है।