अर्थव्यवस्था

WTO में भारत-अमेरिका के बीच बड़ी नोक-झोंक के आसार: नियमों को बदलने की जिद पर अड़ा वाशिंगटन

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बुनियादी नियमों और 'तरजीही राष्ट्र' सिद्धांत को लेकर भारत और अमेरिका के बीच गहरा मतभेद उभर आया है, जिससे वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ गई है

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असित रंजन मिश्र   
Last Updated- March 15, 2026 | 11:06 PM IST

भारत और अमेरिका के बीच विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में सुधारों के मुद्दे पर टकराव की आशंका है। यह मामला संगठन की 14वीं मंत्री स्तरीय बैठक (एमसी 14) से पहले उठ रहा है। भारत का कहना है कि डब्ल्यूटीओ के मूल सिद्धांतों जैसे सर्वसम्मति से निर्णय लेना और भेदभाव-रहित टैरिफ व्यवस्था (तरजीही राष्ट्र) को बदला नहीं जाना चाहिए।

सरकार के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘हमारा मानना है कि डब्ल्यूटीओ के बुनियादी नियम नहीं बदलने चाहिए। पहले जो पुराने मुद्दे लंबित हैं उनका हल किया जाना चाहिए, उसके बाद ही नए विषय जोड़े जाने चाहिए।’

हालांकि अधिकारी ने यह भी कहा कि अमेरिका और भारत दोनों इस बात से सहमत हैं कि डब्ल्यूटीओ में सुधार की प्रक्रिया सदस्य देशों द्वारा ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘देश आपस में बातचीत करके निर्णय लें। किसी ‘सूत्रधार’ की भूमिका सीमित होनी चाहिए। इस मुद्दे पर अमेरिका और भारत के बीच सहमति है।’

पिछले साल दिसंबर में अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ को दिए एक पत्र में कहा था कि तरजीही राष्ट्र (एमएफएन) का सिद्धांत अब के समय के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका के अनुसार यह नियम, देशों को अपने व्यापारिक संबंधों को बेहतर तरीके से विकसित करने से रोकता है। अमेरिका के मुताबिक एमएफएन की वजह से देशों को डब्ल्यूटीओ में एक ही तरह का नियम सभी पर लागू करने की कोशिश करनी पड़ती है। 

दरअसल, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा पहले लगाए गए देश-विशेष बराबरी के टैरिफ डब्ल्यूटीओ के एमएफएन नियमों के खिलाफ थे। बाद में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने इन्हें अवैध घोषित कर दिया। अब संयुक्त राष्ट्र व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने भारत सहित कई व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ धारा 301 के तहत जांच शुरू की है, ताकि देश-विशेष टैरिफ फिर से लागू किए जा सकें।  

अमेरिका का यह भी कहना है कि अब विकसित और विकासशील देशों के बीच का अंतर पहले जैसा स्पष्ट नहीं रहा है ऐसे में सभी देशों को ऐसे व्यापार समझौते करने की अनुमति मिलनी चाहिए जिनका फायदा सभी सदस्यों को नहीं बल्कि केवल उन देशों को मिले जो उस समझौते का हिस्सा हों। डब्ल्यूटीओ सुधारों का मुद्दा 26-29 मार्च को कैमरून के याउंडे में होने वाली डब्ल्यूटीओ की 14वीं मंत्री स्तरीय बैठक में सबसे महत्वपूर्ण चर्चा का विषय हो सकता है। 16-18 दिसंबर को हुई डब्ल्यूटीओ के जनरल काउंसिल बैठक में दिए गए अपने बयान में भारत ने कहा कि नियमों पर आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली में ऐसा नहीं होना चाहिए कि कुछ देशों के लिए नियम असुविधाजनक लगें तो उन्हें बदल दिया जाए या नजरअंदाज कर दिया जाए।

इसने कहा, ‘इस संगठन में सुधार का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि इसके नियमों में विस्तार या बदलकर लागू किया जाए। इससे डब्ल्यूटीओ मजबूत नहीं होगा बल्कि इसके मूल आधार पर भरोसा कम होगा। ऐसा करने से मंत्री स्तरीय फैसलों और मराकेश समझौते की भावना को पीछे से बदल दिया जाएगा, जिससे संगठन का स्वरूप बदल जाएगा और उसे अपूरणीय क्षति हो सकती है।’

दूसरी ओर, अमेरिका ने अपने प्रस्ताव में कहा कि तरजीही राष्ट्र सिद्धांत का उद्देश्य व्यापारिक साझेदारों के बीच भेदभाव रोकना और सभी के साथ समान व्यवहार बरतना था और इसे उस दौर के लिए बनाया गया था जब देशों से उम्मीद की जाती थी कि वे खुली और बाजार आधारित व्यापार नीतियां अपनाएंगे। अमेरिका के अनुसार यह उम्मीद अब अव्यावहारिक साबित हो चुकी है और समय के साथ खत्म हो गई है। 

अमेरिका का कहना है कि आज की दुनिया में देशों के बीच नीतियों में अंतर बढ़ रहा है। कुछ देश निष्पक्ष और बाजार आधारित प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा नहीं देते, कुछ की आर्थिक व्यवस्था डब्ल्यूटीओ सिद्धांतों से मेल नहीं खाती और कई देश लगातार व्यापार अधिशेष बनाए रखते हैं, जिससे घाटे वाले देशों पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ता है। 

First Published : March 15, 2026 | 11:06 PM IST