अर्थव्यवस्था

पश्चिम एशिया संकट व कमजोर मॉनसून बढ़ा सकती हैं चिंताएं, चुनौतियों से निपटने के लिए रहें तैयार: वित्त मंत्रालय

दुनियाभर में तनाव, महंगे ईंधन और कम बारिश से महंगाई का खतरा है। इससे निपटने के लिए वित्त मंत्रालय की सलाह है कि सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव के लिए तैयार रहना होगा

Published by
कृति अंबे   
Last Updated- May 30, 2026 | 5:26 PM IST

वित्त मंत्रालय ने भारत की आर्थिक सेहत को लेकर अपनी नई रिपोर्ट (मंथली इकोनॉमिक रिव्यू) जारी की है। इसमें देश की अर्थव्यवस्था के लिए ‘सतर्कता के साथ मजबूती’ (कॉशियस रेजिलिएंस) का माहौल बताया गया है। मंत्रालय का कहना है कि भारत की अंदरूनी आर्थिक बुनियाद बहुत मजबूत है, लेकिन वैश्विक स्तर पर चल रही उथल-पुथल और कमजोर मॉनसून के चलते सरकार को अपनी आर्थिक और मौद्रिक नीतियों में काफी लचीलापन रखना होगा ताकि विकास की रफ्तार थमे नहीं।

पश्चिम एशिया का संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की चिंता

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए इस समय सबसे बड़ा बाहरी खतरा पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि ‘स्ट्रैट ऑफ होर्मुज’ (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में पैदा हुआ संकट भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है। अगर यह विवाद लंबा खिंचता है, तो भारत के घरेलू बाजारों में महंगाई बढ़ सकती है।

इसकी गंभीरता को इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने वेस्ट गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) क्षेत्र से जितना भी सामान मंगाया, उसमें अकेले कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 53.9 फीसदी थी। अगर वहां के हालात जल्द सामान्य होते हैं, तो मजबूत सर्विसेज एक्सपोर्ट और लगातार हो रहे निवेश के दम पर भारत तेजी से आगे बढ़ेगा।

महंगाई का दोहरा खतरा: ईंधन और खाने-पीने की चीजें

फिलहाल खुदरा महंगाई और थोक महंगाई के बीच का अंतर इशारा कर रहा है कि आने वाले दिनों में आम जनता की जेब पर बोझ बढ़ सकता है। अप्रैल के महीने में खुदरा महंगाई दर 3.48 फीसदी थी, जो रिजर्व बैंक के तय दायरे के भीतर है। लेकिन दूसरी तरफ थोक महंगाई दर 42 महीने के उच्चतम स्तर 8.3 फीसदी पर पहुंच चुकी है। लागत की यह बढ़ोतरी जल्द ही उपभोक्ताओं तक पहुंच सकती है।

इसके अलावा, इसी महीने तेल कंपनियों ने पेट्रोल के दाम 7.35 रुपये प्रति लीटर और डीजल के दाम 7.53 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिए हैं। करीब चार साल में यह पहली इतनी बड़ी बढ़ोतरी है, जिसका सीधा असर मई महीने के खुदरा महंगाई के आंकड़ों में दिखने लगेगा।

Also Read: 10 साल के सबसे खराब मानसून के खतरे के बीच सरकार का बड़ा फैसला, 1 जून से शुरू होगा ‘खेत बचाओ’ अभियान

कमजोर मॉनसून से ग्रामीण मांग पर असर की आशंका

मौसम विभाग (IMD) ने इस साल के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के अनुमान को और घटा दिया है। पहले जहां इसके लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का 92 फीसदी रहने का अनुमान था, उसे अब घटाकर 90 फीसदी कर दिया गया है। यानी इस बार मॉनसून सामान्य से नीचे रहने वाला है।

कम बारिश होने का सीधा असर खेती और खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर पड़ेगा। मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि अगर सूखे के हालात और वैश्विक तनाव एक साथ बने रहे, तो खाद्य सुरक्षा और खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ सकती है। भारत की जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान घरेलू खपत का होता है। अगर ग्रामीण इलाकों में मांग कमजोर हुई, तो इसका असर पूरे देश की विकास दर पर पड़ेगा।

ग्लोबल मार्केट का दबाव और विदेशी निवेशकों का पलायन

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के ऊंचे दाम और बड़े देशों की सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था का असर अब भारत पर भी दिखने लगा है। हालांकि ई-वे बिल जनरेशन, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज PMI के साथ-साथ बिजली की खपत के आंकड़े बेहतर हैं और वे मजबूती का संकेत दे रहे हैं। लेकिन ईंधन की खपत और कोर-सेक्टर के उत्पादन में आई सुस्ती यह बताती है कि वैश्विक मंदी का असर भारत के कुछ हिस्सों पर पड़ना शुरू हो गया है।

पश्चिम एशिया संकट के बाद से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजार से तेजी से दूरी बनाई है। फरवरी में निवेश करने के बाद, युद्ध शुरू होने से लेकर 21 मई तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से कुल 23.6 अरब डॉलर निकाल लिए हैं। इसमें सबसे ज्यादा बिकवाली शेयर बाजार (इक्विटी) में हुई है।

इस भारी बिकवाली, महंगे कच्चे तेल और मजबूत होते अमेरिकी डॉलर की वजह से रुपया भी दबाव में है। युद्ध की शुरुआत के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 4.9 फीसदी कमजोर हो चुका है।

First Published : May 30, 2026 | 5:26 PM IST