अगस्त में भारत की खुदरा महंगाई दर पिछले तीन महीनों के दौरान गिरावट के रुख को पलटते हुए 6.7 फीसदी से बढ़कर 7 फीसदी हो गई। खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से मुद्रास्फीति को बल मिला। मुद्रास्फीति में तेजी से केंद्रीय बैंक पर इस महीने के आखिर में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करने का दबाव बढ़ सकता है भले ही जुलाई में औद्योगिक उत्पादन में भारी गिरावट क्यों न दिखी हो।
अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के कारण ईंधन महंगाई दर घटकर 10.78 फीसदी रह गई लेकिन अनाज, फल एवं सब्जियां और मसाले में तेजी दर्ज की गई। महीने के दौरान अजान की कीमतों में 9.6 फीसदी, फल की कीमतों में 7.4 फीसदी, सब्जियों की कीमतों में 7.4 फीसदी और मसालों की कीमतों में 14.9 फीसदी की वृद्धि हुई है। जहां तक सेवाओं का सवाल है तो शिक्षा और घरेलू वस्तुएं एवं सेवाएं अगस्त में कहीं महंगी हो गईं।
अगस्त में ग्रामीण महंगाई दर शहरी मुद्रास्फीति के मुकाबले अधिक रही। महीने के दौरान ग्रामीण महंगाई दर 7.15 फीसदी रही जबकि शहरी महंगाई दर 6.7 फीसदी दर्ज की गई। राज्यों के बीच पश्चिम बंगाल में 8.9 फीसदी, गुजरात में 8.2 फीसदी, तेलंगाना में 8.1 फीसदी और महाराष्ट्र में 7.99 फीसदी मुद्रास्फीति दर्ज की गई। इन राज्यों में मुद्रास्फीति राष्ट्रीय औसत से ऊपर रहीं। जबकि दिल्ली (4.2 फीसदी), हिमाचल प्रदेश (4.9 फीसदी) और कनार्टक (4.98 फीसदी) में महंगाई दर देश की औसत मुद्रास्फीति से कम रही।
उधर, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों से पता चलता है कि जुलाई में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में वृद्धि की रफ्तार सुस्त पड़ गई। महीने के दौरान औद्योगिक उत्पादन सूचकांक घटकर महज 2.4 फीसदी रह गया जो एक महीना पहले 12.7 फीसदी रहा था। मॉनसूनी बारिश के कारण खनन गतिविधियां थमने से खनन उत्पादन में 3.3 फीसदी का संकुचन देखा गया। जबकि विनिर्माण उत्पादन में 3.2 फीसदी की वृद्धि हुई और बिजली उत्पादन में 2.3 फीसदी का इजाफा हुआ। जहां तक उपयोग आधारित उद्योगों का सवाल है तो अर्थव्यवस्था में निवेश मांग का प्रतिनिधित्व करने वाले पूंजीगत वस्तु उद्योग में 5.8 फीसदी की वृद्धि हुई जबकि कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स में 2 फीसदी का संकुचन दिखा जो ग्रामीण भारत में कमजोर मांग का संकेत देता है।
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी ने कहा कि आईआईपी में भारी गिरावट प्रतिकूल बेस इफेक्ट के साथ-साथ गतिविधियों में क्रमिक गिरावट का नतीजा है। उन्होंने कहा, ‘वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का अनुभव घरेलू विनिर्माताओं को होने लगा है। जुलाई में कपड़ा, पेट्रोलियम उत्पाद, मशीनरी एवं उपकरण जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों की गतिविधियों में क्रमिक आधार पर गिरावट दर्ज की गई। अगले 12 महीनों के दौरान इसमें तेजी आएगी क्योंकि आक्रामक मौद्रिक सख्ती और मुद्रास्फीति में तेजी से प्रमुख उन्नत अर्थव्यस्थाओं के मांग परिदृश्य को झटका लगेगा।’
इंडिया रेटिंग्स के प्रधान अर्थशास्त्री सुनील कुमार सिन्हा ने कहा कि जून 2021 के बाद से शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में अनाज की कीमतों में तेजी से ग्रामीण मांग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि ग्रामीण महंगाई के मुकाबले ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि कम है।