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अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी Moody’s Ratings ने भारत की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान में कटौती की है। एजेंसी ने वर्ष 2026 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 0.8 प्रतिशत अंक घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है। पहले यह अनुमान इससे अधिक था।
एजेंसी का कहना है कि निजी खपत में सुस्ती, निवेश गतिविधियों में धीमापन और औद्योगिक उत्पादन पर दबाव के चलते आर्थिक वृद्धि की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
मूडीज ने अपनी ग्लोबल मैक्रो आउटलुक रिपोर्ट के मई अपडेट में कहा है कि बढ़ती ऊर्जा कीमतों का असर आने वाले महीनों में कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर अलग-अलग तरीके से देखने को मिलेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, ईंधन, उर्वरक और ऊर्जा से जुड़ी आपूर्ति में आने वाली दिक्कतें आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत जैसे देशों पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है, क्योंकि उनकी निर्भरता इन संसाधनों पर काफी है।
मूडीज ने यह भी कहा है कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य फिलहाल काफी अनिश्चित बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और कमजोर पड़ती संघर्ष विराम स्थिति ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है।
एजेंसी का अनुमान है कि इन परिस्थितियों के कारण विभिन्न देशों की विकास दर पर अलग-अलग स्तर पर असर पड़ेगा। भारत के लिए अनुमानित आर्थिक नुकसान लगभग 0.8 प्रतिशत अंक तक हो सकता है।
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वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कैलेंडर वर्ष 2027 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान में कटौती की है। एजेंसी ने जीडीपी ग्रोथ को 0.5 प्रतिशत घटाकर 6 प्रतिशत पर रखा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा वैश्विक और क्षेत्रीय चुनौतियों का असर धीरे-धीरे कम होगा, लेकिन तब तक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बना रहेगा।
मूडीज के अनुसार भारत उच्च तेल कीमतों के प्रति खासा संवेदनशील है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। भारत लगभग 90 प्रतिशत कच्चे तेल और एलएनजी का आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एक शुद्ध अनाज उत्पादक देश होने के कारण निकट भविष्य में कृषि निर्यात को ऊंची कीमतों का लाभ मिल सकता है। हालांकि, दूसरी ओर ईंधन और उर्वरक की बढ़ती लागत सरकार के वित्तीय बोझ को बढ़ा सकती है। इससे सरकारी राजकोषीय स्थिति प्रभावित हो सकती है और प्रस्तावित पूंजीगत खर्च पर भी दबाव पड़ सकता है।
मूडीज ने यह भी उल्लेख किया कि भारत की बिजली उत्पादन क्षमता में कोयले की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत बनी हुई है। हालांकि, इसके साथ ही देश में सौर, पवन और जल ऊर्जा जैसे गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का विस्तार लगातार जारी है। यह बदलाव भविष्य में ऊर्जा संरचना को अधिक संतुलित बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
एजेंसी के अनुसार वर्ष 2026 और 2027 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत रह सकती है, जबकि 2025 में यह 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह गिरावट मुख्य रूप से निजी उपभोग, पूंजी निवेश और औद्योगिक गतिविधियों में कमजोरी के कारण बताई गई है।
ऊंची ऊर्जा लागत से बढ़ेगी महंगाई और घटेगा मुनाफा
मूडीज ने कहा है कि लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतें महंगाई को ऊंचे स्तर पर बनाए रखेंगी। इससे कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ेगा, निवेश की गति धीमी होगी और कई देशों की सार्वजनिक वित्तीय स्थिति पर भी असर पड़ेगा। इसके साथ ही वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रमुख केंद्रीय बैंक फिलहाल नीतिगत बदलाव को लेकर इंतजार की स्थिति में हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर वित्तीय स्थितियों को और सख्त करने के लिए तैयार रहेंगे। इससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बनी रह सकती है।
मूडीज ने अमेरिका और ईरान के बीच लंबी चल रही वार्ताओं, समुद्री मार्गों में बाधा और सैन्य तनाव के बढ़ते जोखिम को लेकर भी चिंता जताई है। इन कारणों से संघर्ष विराम की स्थिरता पर सवाल उठ सकते हैं। यदि स्थिति बिगड़ती है तो वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल और गैस की आवाजाही बाधित होती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा। महंगाई और आर्थिक विकास पर इसका प्रभाव इस व्यवधान की अवधि पर निर्भर करेगा।
भारत की बात करें तो देश अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें से करीब 90 प्रतिशत आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है। ऐसे में किसी भी बाधा का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई एशियाई देश अपने तेल आयात स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काम कर रहे हैं। वे मौजूदा साझेदारों से आयात बढ़ाने के साथ-साथ नए आपूर्ति स्रोतों की भी तलाश कर रहे हैं, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके।
रिपोर्ट के अनुसार भारत रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ा रहा है, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया धीरे-धीरे अमेरिकी कच्चे तेल की ओर रुख कर रहे हैं।
Moody’s का कहना है कि भारत अभी भी ऊर्जा आपूर्ति के मामले में संवेदनशील स्थिति में बना हुआ है। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने की रणनीति ने अल्पकालिक राहत दी है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने से जोखिम भी कायम हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि जापान और दक्षिण कोरिया अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाते हुए अमेरिकी कच्चे तेल की खरीद बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव उनकी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
Moody’s ने चेतावनी दी है कि वैश्विक ऊर्जा संकट के प्रभाव अलग-अलग देशों पर अलग तरह से पड़ रहे हैं, लेकिन एशिया-प्रशांत क्षेत्र सबसे अधिक जोखिम में है। यहां कई अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिससे वे वैश्विक उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील बन जाती हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देशों के पास मौजूद रणनीतिक तेल भंडार केवल कुछ समय के लिए ही राहत दे सकते हैं। अगर वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित रहती है, तो आने वाले महीनों में भौतिक ऊर्जा कमी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
Moody’s के अनुसार चीन इस संकट से कुछ हद तक सुरक्षित स्थिति में है, क्योंकि वहां ऊर्जा उत्पादन में कोयले और नवीकरणीय ऊर्जा की बड़ी हिस्सेदारी है। वहीं भारत अभी भी अधिकतर तेल आयात पर निर्भर होने के कारण अधिक जोखिम में है।