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वैश्विक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बावजूद वैश्विक वित्तीय संस्था Morgan Stanley ने भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर अपना नजरिया और मजबूत किया है। संस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले अप्रैल 2026 में यह अनुमान 6.2 प्रतिशत रखा गया था।
संस्था का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में पहले के मुकाबले आई नरमी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए राहत का काम करेगी। इसी वजह से विकास दर को लेकर अनुमान में सुधार किया गया है।
Morgan Stanley ने अपने ताजा आकलन में कच्चे तेल की औसत कीमत का अनुमान भी घटाया है। अप्रैल 2026 में संस्था ने FY27 के दौरान क्रूड ऑयल की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान जताया था। उस समय गैस की उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई गई थी।
अब संस्था ने तेल की औसत कीमत का अनुमान घटाकर 87.5 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक तेल कीमतें जून 2026 तिमाही में अपने उच्च स्तर पर पहुंच सकती हैं, लेकिन उसके बाद इनमें धीरे-धीरे नरमी आने की संभावना है।
Morgan Stanley की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट Upasana Chachra ने अपनी सह-लेखक रिपोर्ट में अर्थशास्त्री Bani Gambhir और Shreya Singh के साथ कहा कि ऊर्जा कीमतों का सबसे ज्यादा असर जून 2026 तिमाही में देखने को मिल सकता है। इस दौरान ऊंची कमोडिटी कीमतों और सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियों के कारण आर्थिक गतिविधियों पर दबाव रह सकता है।
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जैसे-जैसे सप्लाई से जुड़ी बाधाएं कम होंगी और कमोडिटी कीमतों में नरमी आएगी, वैसे-वैसे आर्थिक गतिविधियां सामान्य होने लगेंगी।
रिपोर्ट में सिर्फ FY27 ही नहीं, बल्कि FY28 को लेकर भी सकारात्मक तस्वीर पेश की गई है। संस्था ने अनुमान जताया है कि वित्त वर्ष 2027-28 में भारत की GDP वृद्धि दर 7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2027 तक भारतीय अर्थव्यवस्था फिर से अपने सामान्य ट्रेंड की ओर लौटती दिख सकती है। मजबूत घरेलू मांग, सरकारी निवेश और स्थिर मैक्रोइकोनॉमिक हालात भारत की विकास गति को सहारा देंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे घरों और कंपनियों पर खर्च का दबाव बढ़ेगा, वैसे-वैसे उपभोग और निवेश में कटौती देखने को मिल सकती है, जिससे आर्थिक विकास प्रभावित होगा।
आगे की स्थिति पर बात करते हुए विश्लेषकों ने कहा कि बाहरी मांग में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। यह काफी हद तक मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव की अवधि और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में प्रगति पर निर्भर करेगा।
मॉर्गन स्टेनली के मुताबिक, अगर तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका पहला असर निर्यात पर दिखाई दे सकता है। वैश्विक विकास और व्यापार की रफ्तार धीमी होने के साथ-साथ माल ढुलाई और बीमा लागत बढ़ने से निर्यात कमजोर पड़ सकता है।
विश्लेषकों ने लिखा, “हमारे बेस केस अनुमान के अनुसार, 2026 में वैश्विक विकास दर घटकर 3.2 प्रतिशत रह सकती है, जो 2025 में 3.5 प्रतिशत थी। वहीं, अमेरिका की विकास दर 2.2 प्रतिशत और यूरोप की 0.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो पहले के अनुमानों से कम है। प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की धीमी आर्थिक वृद्धि का असर बाहरी मांग पर पड़ेगा। इसका सबसे ज्यादा असर वस्तुओं के निर्यात पर देखने को मिल सकता है, जबकि सेवा क्षेत्र का निर्यात बेहतर प्रदर्शन जारी रख सकता है और कुछ राहत दे सकता है।”
दूसरी ओर, ग्रामीण खपत में मजबूती देखने को मिली है। मॉर्गन स्टैनली के अनुसार, लगातार आठ तिमाहियों से ग्रामीण मांग शहरी मांग से बेहतर रही है। इसकी बड़ी वजह लगातार दो साल सामान्य से बेहतर मानसून और नियंत्रित महंगाई रही, जिससे लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ी है।
हालांकि, मॉर्गन स्टैनली ने चेतावनी दी है कि 2026 में कमजोर मानसून की संभावना पर नजर रखने की जरूरत होगी। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अल नीनो के असर के चलते कमजोर मानसून का अनुमान जताया है। इसके अलावा बीज और उर्वरक जैसी जरूरी कृषि सामग्री की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बनी हुई है। इनका असर खेती की पैदावार और किसानों की आय पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने फिलहाल कई चुनौतियां बनी हुई हैं और जोखिम नीचे की ओर ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर आर्थिक सुस्ती और बाहरी दबाव इसके प्रमुख कारण हैं।
हालांकि, अगर वैश्विक कमोडिटी कीमतों में उम्मीद से ज्यादा तेजी से नरमी आती है, तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है। इससे कंपनियों की कमाई, कारोबारी माहौल और निवेश चक्र को मजबूती मिलने की संभावना है।
मॉर्गन स्टैनली के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़े जोखिमों में वैश्विक अनिश्चितता, दुनिया की धीमी आर्थिक वृद्धि, सख्त वित्तीय परिस्थितियां और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में किसी भी तरह की नकारात्मक स्थिति शामिल हैं। ये सभी कारक विकास और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) वित्त वर्ष 2027 में ब्याज दरों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं कर सकता है। आरबीआई विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करेगा।
वहीं, वित्त वर्ष 2028 में ब्याज दरों में हल्की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। मॉर्गन स्टैनली का अनुमान है कि उस दौरान आरबीआई पहली छमाही में 25-25 बेसिस प्वाइंट की दो बढ़ोतरी कर सकता है, जिससे रीपो रेट बढ़कर 5.75 फीसदी तक पहुंच सकती है। इसकी वजह महंगाई का 5 फीसदी से ऊपर बने रहना और आर्थिक वृद्धि का मजबूत रहना माना गया है।