अर्थव्यवस्था

S&P ग्लोबल की रिपोर्ट: तेल संकट से बिगड़ेगा भारत का राजकोषीय गणित, GDP ग्रोथ पर ब्रेक लगने का डर

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार थाम सकती हैं। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ने, कॉर्पोरेट मुनाफा घटने और आम आदमी के लिए महंगाई बढ़ने का बड़ा खतरा है

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अहोना मुखर्जी   
Last Updated- April 14, 2026 | 9:23 PM IST

भारत की आर्थिक वृद्धि को कच्चे तेल की कीमतों में 130 डॉलर प्रति बैरल तक की लगातार वृद्धि धीमा कर सकती है। यह वृद्धि राजकोषीय मैट्रिक्स को कमजोर कर सकती है और कॉर्पोरेट व बैंकिंग क्षेत्र के प्रदर्शन पर दबाव डाल सकती है। एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स के मंगलवार को जारी परिदृश्य विश्लेषण का अनुमान है कि कच्चे तेल के दामों में वृद्धि से भारत की आर्थिक वृद्धि के आधारभूत अनुमानों में 80 आधार अंक तक कम हो सकती है जबकि सरकार की राजकोषीय स्थिति अस्थायी रूप से बिगड़ सकती है।

दबाव के माहौल में कॉरपोरेट क्षेत्र की कमाई पर दबाव पड़ने का अनुमान है। इसमें एबिटा में 15 से 25 प्रतिशत की गिरावट और फायदे में लगभग 0.5 से 1 गुना तक की वृद्धि होगी। बैंकिंग प्रणाली में भी संपत्ति की गुणवत्ता में कुछ गिरावट देखने की उम्मीद है। इसमें कमजोर ऋण लगभग 3.5 प्रतिशत तक बढ़ जाएंगे।

एसऐंडपी की विज्ञप्ति के अनुसार, ‘उच्च ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति व्यवधानों की कठिनाइयां महीनों तक बना रह सकती है। इससे परिवारों, निगमों और बैंकों की आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश लगेगा।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा क्षेत्र की दिक्क्तें कई स्तरों पर महसूस की जा सकती हैं। लिहाजा चालू खाता शेष बिगड़ना, उत्पादन लागत में वृद्धि, उपभोक्ता कीमतों में वृद्धि और राजकोषीय दबाव पर असर पड़ सकता है। इसमें कहा गया कि तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की  वृद्धि लगातार बने रहने से चालू खाते का घाटा जीडीपी का 0.4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। हालांकि विदेशी में अधिक धन भेजे जाने की जरूरतें और जोखिम-से-पलायन पूंजी प्रवाह के बीच रुपया में गिरावट का दबाव पड़ सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार बढ़ती इनपुट लागत से कॉरर्पोरेट मार्जिन के कम होने की उम्मीद है और उच्च कीमतों को अंततः उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा। इससे क्रय शक्ति कम होगी और मांग कमजोर होगी। रिपोर्ट  के अनुसार ‘ऊर्जा आपूर्ति व्यवधान जोखिम विकास को बाधित कर सकता है। इस जोखिम में ईंधन की राशनिंग या डाउनस्ट्रीम पेट्रोकेमिकल्स और उर्वरक जैसे संबंधित उत्पादों की कमी हो सकती है।’

राजकोषीय दबाव बढ़ने की आशंका है। इसका कारण यह है कि सरकार को ईंधन करों में कटौती या सब्सिडी बढ़ाकर झटके का कुछ हिस्सा झेलना पड़ सकता है। इससे राजस्व संग्रह प्रभावित हो सकता है और राजकोषीय समेकन प्रयासों में देरी हो सकती है।

यदि सब्सिडी खर्च बढ़ता है तो घाटे के लक्ष्य चूकने की आशंका है। बाहरी मोर्चे पर उच्च तेल आयात बिल और मध्य पूर्व से कम धन भेजे जाने की आशंका के कारण चालू खाता घाटा बढ़ने की उम्मीद है। विनिमय दर और कमजोर हो सकती है, जिससे आयातित मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि आपूर्ति व्यवधान कारोबार के संचालन को प्रभावित करते हैं तो कॉरपोरेट क्षेत्र का तनाव बढ़ सकता है। ऐसे परिदृश्य में जहां व्यवधान छह महीने तक रहता है, क्षमता उपयोग में कमी के कारण कमाई 25-30 प्रतिशत तक गिर सकती है। रसायन, रिफाइनिंग, एयरलाइंस, सीमेंट, धातु व खनन, इस्पात और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।

बैंकों के कुछ खंडों विशेष रूप से छोटे व मध्यम आकार के उद्यमों, असुरक्षित खुदरा ऋणों और सूक्ष्म वित्त में बढ़ते तनाव को देखा जा सकता है। ऋण नुकसान में वृद्धि का अनुमान है जबकि उच्च प्रावधान आवश्यकताओं के कारण लाभप्रदता पर दबाव आ सकता है।

वैश्विक एजेंसियों और वित्तीय संस्थानों ने भारत के वृद्धि के पूर्वानुमानों को कम करना शुरू कर दिया है। दरअसल, पश्चिम एशिया संघर्ष ऊर्जा बाजार बाधित होने और महंगाई के बढ़ते जोखिमों के कारण वृद्धिके पूर्वानुमानों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

 भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के वृद्धि अनुमान को घटाकर 6.9 प्रतिशत तक कर दिया है, जबकि विश्व बैंक ने तेल आपूर्ति व्यवधान व बढ़ती कीमतों के बारे में चिंताओं के बीच अपने 6.6 प्रतिशत अनुमान के लिए नीचे की ओर जोखिमों को चिह्नित किया है।

First Published : April 14, 2026 | 9:22 PM IST