पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में हुए 3 रुपये प्रति लीटर के इजाफे से सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) को कुछ राहत मिली है। सरकार के मुताबिक, इससे कंपनियों का रोजाना घाटा करीब 25 फीसदी घट गया है। पहले जहां कंपनियों को रोज लगभग 1000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था, अब यह घटकर करीब 750 करोड़ रुपये रह गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने बताया कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और रुपये की कमजोरी की वजह से तेल कंपनियों पर भारी दबाव बना हुआ है। हालांकि दाम बढ़ने के बाद भी पेट्रोल और डीजल अभी लागत से कम कीमत पर बेचे जा रहे हैं।
क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, तेल कंपनियों को अभी भी पेट्रोल पर करीब 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 13 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। अनुमान है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो मई के अंत तक कंपनियों का कुल घाटा 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि 3 रुपये की बढ़ोतरी से कंपनियों की परेशानी कुछ कम हुई है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। पिरामल ग्रुप के मुख्य अर्थशास्त्री देबोपम चौधरी के अनुसार, जब तक कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे नहीं आतीं, तब तक तेल कंपनियों को राहत मिलना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में तेल कंपनियों की कमाई सुधारने के लिए पेट्रोल-डीजल के दामों में कम से कम 10 फीसदी और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है।
सरकार के सामने अब बड़ा सवाल यह है कि क्या पेट्रोल-डीजल के दाम और बढ़ाए जाएं या फिर कंपनियों को सरकारी मदद दी जाए। महिंद्रा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नीलांजन बनिक के मुताबिक, सरकार के पास तीन रास्ते हैं –
उन्होंने कहा कि सरकार संभवतः इन तीनों का मिश्रण अपनाएगी। जरूरत पड़ने पर ट्रांसपोर्ट, किसानों या कुछ सेक्टरों को लक्षित सब्सिडी दी जा सकती है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ेगी, जिसका असर आम लोगों पर भी पड़ेगा। डीजल महंगा होने से माल ढुलाई खर्च बढ़ता है, जिससे खाने-पीने और रोजमर्रा की चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे खुदरा महंगाई में 0.1 से 0.3 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है।
भारत पहले भी कई बार तेल संकट का सामना कर चुका है। 2008 में जब कच्चे तेल की कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, तब सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने के लिए ऑयल बॉन्ड और सब्सिडी का सहारा लिया था। लेकिन इस बार सरकार बड़े पैमाने पर सब्सिडी देने से बच रही है और धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाकर बोझ कम करने की कोशिश कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव जारी रहा और कच्चा तेल महंगा बना रहा, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल के दाम फिर बढ़ सकते हैं। फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के राहुल अहलूवालिया का कहना है कि ऊंचे दाम लोगों को पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए मजबूर करेंगे और यही बाजार का स्वाभाविक तरीका है। फिलहाल सरकार संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। एक तरफ धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाई जा रही हैं, दूसरी तरफ सीधे बड़े राहत पैकेज से बचा जा रहा है।