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RBI MPC Meet 2026: भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक (RBI MPC Meet) आज यानी बुधवार, 8 अप्रैल को होने जा रही है, और बाजार में उम्मीद है कि इस बार रीपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। हालांकि, इस फैसले से ज्यादा ध्यान उन संकेतों पर रहेगा जो RBI आगे के आर्थिक जोखिमों को लेकर दे सकता है।
अर्थशास्त्रियों के एक सर्वे के अनुसार, जिसमें Bloomberg और Business Standard की पोल शामिल है, ज्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि RBI रीपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखेगा। फरवरी की शुरुआत में हुई पिछली बैठक में भी केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में बदलाव नहीं किया था और संकेत दिया था कि फिलहाल एक लंबा ठहराव जारी रह सकता है।
इस बार की बैठक खास इसलिए भी है क्योंकि यह पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बाद RBI की पहली नीति बैठक है। इस भू-राजनीतिक स्थिति ने वैश्विक तेल बाजारों और मुद्रा बाजारों पर दबाव बढ़ा दिया है, जिसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी देखा जा रहा है। रुपये में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी RBI के लिए प्रमुख चिंता का विषय बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ रीपो रेट का फैसला इस बार पूरी कहानी नहीं बताएगा। अगर दरों में कोई बदलाव नहीं होता है, तब भी बाजार RBI के रुख को समझने के लिए कई अन्य संकेतों पर नजर रखेगा।
Reserve Bank of India की ओर से अगर दरों में कोई बदलाव नहीं भी होता है, तब भी बाजार यह देखेगा कि आगे केंद्रीय बैंक का रुख कैसा रहता है। निवेशकों और विश्लेषकों की नजर खास तौर पर कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी मुद्रा बाजार, बॉन्ड यील्ड और बाजार में तरलता की स्थिति पर होगी।
इस समय वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं और ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चल रहा है। ऐसे में महंगाई और आयात लागत को लेकर चिंताएं बनी रहती हैं। साथ ही, वैश्विक वित्तीय प्रवाह में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिल रहा है, जो उभरते बाजारों पर असर डाल सकता है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है. ऐसे में भारत के लिए सबसे अहम संकेतक के तौर पर ब्रेंट क्रूड सामने आता है। इसकी वजह साफ है, भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हर हलचल सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर असर डालती है।
तेल महंगा होने का सबसे पहला असर महंगाई पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल के साथ परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे रोजमर्रा की चीजें भी महंगी होने लगती हैं। इसके अलावा, आयात बिल बढ़ने से चालू खाते का घाटा भी दबाव में आता है।
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वैश्विक स्तर पर बढ़ते उतार-चढ़ाव का असर अब सीधे भारतीय बाजारों में दिखने लगा है और इसमें रुपये की भूमिका सबसे अहम बन गई है। हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर करीब 95 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक के दखल के बाद इसमें कुछ सुधार आया और यह 93 के आसपास स्थिर होता दिख रहा है।
केंद्रीय बैंक ने सट्टा कारोबार पर सख्ती जैसे कई कदम उठाए हैं, जिससे रुपये को संभालने में मदद मिली है। इसके बावजूद बाजार में उतार-चढ़ाव अभी भी बना हुआ है, जो निवेशकों की चिंता बढ़ा रहा है।
Bloomberg की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर रुपये में अचानक या बहुत तेज गिरावट आती है, तो यह बाहरी दबाव बढ़ने का साफ संकेत होगा। रुपये की कमजोरी का असर सिर्फ मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे आयातित महंगाई भी बढ़ती है। खासकर तेल और कमोडिटी की कीमतों पर इसका सीधा असर पड़ता है, जो आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ा सकता है।
सरकारी बॉन्ड की यील्ड इस बात का ताजा संकेत देती है कि कर्ज बाजार, रिजर्व बैंक की नीतियों को कैसे देख रहा है। हाल के हफ्तों में 10 साल की बॉन्ड यील्ड 7 फीसदी के पार चली गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे वैश्विक दबाव और आगे सख्त वित्तीय हालात की आशंकाएं हैं।
अगर आरबीआई ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करता और इसके बावजूद यील्ड बढ़ती रहती है, तो यह इस बात का संकेत होगा कि बाजार को महंगाई या सरकारी उधारी को लेकर चिंता है।
वहीं, अगर यील्ड स्थिर रहती है या नीचे आती है, तो इसका मतलब होगा कि बाजार को आरबीआई का रुख भरोसेमंद लग रहा है और मौजूदा जोखिमों से निपटने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।
नीतिगत दरों में बदलाव न होने के बाद भी यह समझना जरूरी है कि सिस्टम में नकदी की स्थिति कैसी है। बैंकिंग सिस्टम में उपलब्ध लिक्विडिटी और शॉर्ट टर्म मनी मार्केट रेट्स यह बताते हैं कि आरबीआई की नीति का असर जमीन पर कितना दिख रहा है।
हाल के समय में फॉरेक्स मार्केट में आरबीआई के दखल और पूंजी के बाहर जाने से लिक्विडिटी पर असर पड़ा है। रॉयटर्स के हवाले से विश्लेषकों का कहना है कि इन वजहों से बैंकिंग सिस्टम में नकदी कम हो सकती है और शॉर्ट टर्म ब्याज दरों पर दबाव बढ़ सकता है।
अगर ओवरनाइट रेट्स ऊंचे बने रहते हैं या लिक्विडिटी और सख्त होती है, तो यह संकेत होगा कि असल में मौद्रिक हालात उतने सहज नहीं हैं, जितना नीतिगत बयान से लगता है।
आरबीआई सीधे तौर पर यह नहीं बताता कि वह बाजार में कब और कितना दखल दे रहा है, लेकिन इसकी झलक रुपये की चाल और बाजार में नकदी की स्थिति से मिल जाती है।
हाल के दिनों में सट्टेबाजी पर लगाम लगाने और रुपये को संभालने के लिए उठाए गए कदम यह दिखाते हैं कि केंद्रीय बैंक मुद्रा में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं चाहता। विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल किसी तय स्तर को बचाने के लिए नहीं, बल्कि अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए किया जाता है।
ऐसे में जानकारों का मानना है कि अगर बाजार में लगातार दखल के संकेत मिलते हैं, तो इसका मतलब होगा कि आरबीआई महंगाई पर नजर रखने के साथ-साथ रुपये को स्थिर रखने को भी बराबर अहमियत दे रहा है।
आरबीआई गवर्नर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बार बाजार की नजर खास तौर पर आयातित महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं पर रहने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गवर्नर रुपये की स्थिरता या बाजार के सुचारू संचालन पर ज्यादा जोर देते हैं, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि नीतिगत प्राथमिकताओं में कुछ बदलाव आ रहा है।
इसके अलावा, गवर्नर के बयान का रुख भी काफी अहम होगा। अगर वे ज्यादा ध्यान बाजार में उतार-चढ़ाव के जोखिमों पर देते हैं, तो इससे सतर्क रुख का संकेत मिलेगा। वहीं, अगर फोकस आर्थिक वृद्धि को सहारा देने पर रहता है, तो यह आगे नरम नीतियों की उम्मीद जगा सकता है।
अगर आरबीआई ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करता, तो सिर्फ पॉलिसी बयान से पूरी तस्वीर साफ नहीं होगी। असली संकेत अगले 24 से 72 घंटों में बाजार के अलग-अलग हिस्सों से मिलेंगे।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, रुपये की चाल, बॉन्ड यील्ड का रुख, सिस्टम में नकदी की स्थिति और आरबीआई के दखल के संकेत ये सब मिलकर बताएंगे कि बाजार इस फैसले को कैसे समझ रहा है।
इन संकेतों से यह भी साफ होगा कि अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है या हालात फिलहाल काबू में हैं।