प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ‘अर्थव्यवस्था की स्थिति’ रिपोर्ट में कहा है कि पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध से आपूर्ति बाधित हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अपनी तेल की 80 प्रतिशत जरूरतें आयात से पूरी करता है, ऐसे में किसी भी प्रतिकूल प्रभाव को सीमित करने के लिए सक्रिय उपायों की आवश्यकता है, भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था की बाहरी झटकों को सहन करने की क्षमता समय के साथ मजबूत हुई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने दूसरे स्रोतों से भी कच्चे तेल का आयात आरंभ कर दिया है। साथ ही उसने अपनी घरेलू तेलशोधन क्षमता को भी बढ़ाया है।
डॉनल्ड ट्रंप द्वारा पश्चिम एशिया युद्ध में 5 दिन के विराम की घोषणा करने के कुछ पहले इस रिपोर्ट का ब्योरा जारी किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कच्चे तेल पर भारत की बाहरी निर्भरता को देखते हुए विकसित हो रही स्थिति की कड़ी निगरानी और प्रतिकूल प्रभावों को सीमित करने के लिए सक्रिय उपायों की आवश्यकता है। हालांकि यह उल्लेख करना महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बाहरी झटकों को अवशोषित करने की क्षमता और लचीलापन समय के साथ मजबूत हुआ है, जो इसकी मजबूत वृद्धि, सुदृढ़ व्यापक आर्थिक बुनियादी सिद्धांतों और मजबूत बाहरी क्षेत्र बफर्स की वजह से है।’
संघर्ष की शुरुआत के बाद से वैश्विक ईंधन आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान के तत्काल प्रभाव को कम करने और इसकी कमी को पूरा करने के लिए घरेलू क्षमता के अधिक प्रभावी उपयोग के लिए कई नीतिगत उपाय किए गए हैं।
रिजर्व बैंक के कर्मचारियों द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट में कहा गया है, ‘एक आर्थिक स्थिरीकरण कोष का निर्माण करने से प्रतिकूल वैश्विक स्थितियों से निपटने के लिए अधिक राजकोषीय गुंजाइश बनाने में मदद मिलेगी।’ यह साफ किया गया है कि रिपोर्ट में दिए गए विचार लेखकों के हैं, रिजर्व बैंक के नहीं। पश्चिम एशिया में भू राजनीतिक तनाव एक बड़े संघर्ष में बदल गया है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण तेल के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा गलियारों में व्यवधान पैदा हुआ है।
इसके अलावा अमेरिकी प्रशासन ने प्रमुख व्यापारिक भागीदारों के साथ होने वाले कारोबार की स्थिति की नए सिरे से जांच भी शुरू की है। इसमें कहा गया है, ‘इन सभी कारकों की वजह से विभिन्न वस्तु और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है।’ इसमें कहा गया है कि जोखिम से बचने की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव आया, जबकि सुरक्षित आश्रय की तलाश के कारण अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ। इसमें कहा गया है, ‘बढ़ी हुई अनिश्चितता के इस माहौल में प्रमुख प्रणालीगत केंद्रीय बैंकों ने फरवरी-मार्च के दौरान नीतिगत दरों को अपरिवर्तित रखा।’
केंद्रीय बैंक की 6 सदस्यों वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक 6 से 8 अप्रैल को होने वाली है।
घरेलू वित्तीय बाजारों पर टिप्पणी करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार में बढ़ी हुई अस्थिरता के बीच रुपये पर अवमूल्यन का नया दबाव आया। रुपया 93.97 के नए सर्वकालिक निम्न स्तर पर बंद हुआ और मार्च में 3.19 प्रतिशत गिर गया। वित्त वर्ष 2026 में यह अब तक डॉलर के मुकाबले 9 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।