भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता बढ़ती नजर आ रही है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, महंगे कच्चे तेल और कमजोर मानसून की आशंका से आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक ग्रोथ पर दबाव पड़ सकता है।
एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और पूर्व नीति निर्माताओं के साथ हुई चर्चा में यह संकेत मिला कि फिलहाल अर्थव्यवस्था के सामने जोखिम ज्यादा बढ़ गए हैं।
अधिकारियों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी परेशानियां लंबे समय तक बनी रहती हैं और मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो इसका असर सीधे महंगाई और ग्रोथ दोनों पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक देश की आर्थिक गतिविधियों में थोड़ी सुस्ती के संकेत दिखने लगे हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस PMI, IIP, कोर सेक्टर डेटा, बिजनेस कॉन्फिडेंस और कंज्यूमर कॉन्फिडेंस जैसे कई बड़े संकेतकों में नरमी दिखाई दे रही है। इसके अलावा एल-नीनो की वजह से सामान्य से कमजोर मानसून की आशंका भी बनी हुई है। अगर बारिश कम रहती है तो इसका असर खेती, ग्रामीण मांग और खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल तेल और ऊर्जा की सप्लाई को लेकर कोई बड़ी दिक्कत नहीं है। हालांकि पश्चिम एशिया में ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान और उत्पादन में कटौती की वजह से कीमतें सितंबर तक ऊंची बनी रह सकती हैं। रिपोर्ट में अमेरिकी ऊर्जा एजेंसी EIA का भी हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 96 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। हालांकि 2027 में कीमतें घटकर करीब 76 डॉलर प्रति बैरल तक आने का अनुमान है।
सरकारी अधिकारियों ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर कोई साफ संकेत नहीं दिया। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो सरकार पूरी मार खुद नहीं झेल पाएगी। ऐसे में कुछ बोझ कंपनियों और ग्राहकों पर भी डाला जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती सरकार को सालाना करीब 1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा सकती है। सरकार ने पहले ही करीब 1 लाख करोड़ रुपये का Economic Stabilization Fund बनाया हुआ है, ताकि जरूरत पड़ने पर आर्थिक झटकों से निपटा जा सके।
रिपोर्ट में RBI के अनुमान का भी जिक्र किया गया है। इसके मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10 फीसदी की बढ़ोतरी होती है और उसका असर ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है, तो महंगाई करीब 0.5 फीसदी बढ़ सकती है। साथ ही आर्थिक ग्रोथ पर भी असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती अनिश्चितता की वजह से निजी कंपनियां फिलहाल नए निवेश को लेकर सावधानी बरत सकती हैं। ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो प्राइवेट कैपेक्स यानी निजी निवेश तब तेजी पकड़ता है जब लगातार दो तिमाहियों तक क्षमता उपयोग 80 फीसदी से ऊपर बना रहता है। फिलहाल कंपनियां बड़े निवेश फैसलों को टाल सकती हैं।
सरकारी अधिकारियों को इस बात की ज्यादा चिंता नहीं है कि लोन ग्रोथ लगातार डिपॉजिट ग्रोथ से ज्यादा बनी हुई है। हालांकि इससे बैंकों के मार्जिन पर थोड़ा दबाव आ सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यूरोप, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे विकसित देशों के साथ व्यापार समझौतों की वजह से आने वाले समय में भारत में विदेशी निवेश बढ़ सकता है। हालांकि भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है और इसमें देरी हो सकती है।