रुपया बुधवार को 23 पैसे टूटकर अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 92.63 प्रति डॉलर (अस्थायी) के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया।
Rupee at Record Low: मजबूत डॉलर और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के दबाव में रुपया बुधवार को 23 पैसे टूटकर अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 92.63 प्रति डॉलर (अस्थायी) के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। फॉरेक्स ट्रेडर्स ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भी बाजार के सेटीमेंट को कमजोर किया। एक्सपर्ट्स का कहना है कि रुपये की कमजोरी का असर सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह महंगाई, निवेश, व्यापार और आम लोगों की जेब तक गहरा प्रभाव डालता है।
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 92.42 के भाव पर खुला और अधिकांश समय 92.41-92.48 के दायरे में कारोबार करता रहा। लेकिन सत्र के अंतिम चरण में गिरावट के साथ यह 92.63 पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान एक समय यह 92.65 प्रति डॉलर के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर भी आया। इससे पहले मंगलवार को रुपया 92.47 के स्तर को छूने के बाद 92.40 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था।
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एलकेपी सिक्योरिटीज के वीपी रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटी और करेंसी) जतीन त्रिवेदी कहते हैं, “रुपये में गिरावट की मुख्य वजह बढ़ता आयात बिल है, जो रुपये पर लगातार दबाव बना रहा है। कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं और हॉर्मुज स्ट्रेट से शिपमेंट में रुकावट के कारण भारत के लिए आयात लागत और बढ़ने की चिंता है।” कुल मिलाकर आर्थिक माहौल फिलहाल कमजोर है। कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, जिससे रुपये पर दबाव बना रहेगा।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी हेड अनिल कुमार भंसाली ने कहा, “प्रमुख केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक समीक्षा बैठक से पहले रुपया नए निचले स्तर पर पहुंच गया। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इसे 92.50 के स्तर के पार जाने दिया।”
त्रिवेदी ने आगे कहा कि बाजार अब अमेरिका के फेडरल रिजर्व (US Fed) के नीतिगत फैसले पर नजर रख रहा है, क्योंकि इससे डॉलर की दिशा तय होगी और इसका असर रुपये पर भी पड़ेगा। आने वाले समय में रुपया डॉलर के मुकाबले 92.25 से 92.95 के दायरे में कमजोर ही रह सकता है।
इस बीच, दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स 0.05 फीसदी बढ़कर 99.62 पर कारोबार कर रहा था। वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड लगभग स्थिर रुख के साथ 103.4 डॉलर प्रति बैरल पर रहा।
महंगाई बढ़ेगी: रुपये में कमजोरी का सबसे बड़ा असर महंगाई पर पड़ता है। भारत एक आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था है, खासकर कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई जरूरी कच्चे माल के मामले में। जब रुपया गिरता है, तो इन वस्तुओं को खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, गैस, खाद्य पदार्थों और अन्य रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर पड़ता है, जिससे आम लोगों के लिए भी लागत बढ़ जाती है।
तेल आयात महंगा: रुपये की कमजोरी का सीधा असर कच्चे तेल के आयात बिल पर दिखता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% तेल आयात करता है और इसका भुगतान डॉलर में होता है। ऐसे में रुपया गिरने पर तेल आयात की लागत तेजी से बढ़ जाती है। इससे या तो सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ता है या तेल कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी करती हैं। नतीजतन पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, परिवहन लागत बढ़ती है और इसका असर पूरे सप्लाई चेन पर दिखाई देता है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते पहले से ही कच्चे तेल और एलपीजी की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे माहौल में रुपये की कमजोरी तेल आयात को और महंगा बनाकर अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
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विदेशी निवेश में गिरावट: विदेशी निवेश के मोर्चे पर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है। कमजोर रुपया विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के लिए जोखिम बढ़ाता है, क्योंकि उनके निवेश की वैल्यू घट सकती है। इससे वे भारतीय बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं, जिससे शेयर बाजार में गिरावट और अस्थिरता बढ़ती है।
कर्ज का बोझ बढ़ेगा: विदेशी कर्ज लेने वाली कंपनियों और सरकार के लिए स्थिति और मुश्किल हो जाती है। जब रुपया कमजोर होता है, तो डॉलर में लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे कंपनियों की बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ता है और उनके मुनाफे पर असर पड़ता है।
करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ेगा: करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) यानी चालू खाता घाटा भी बढ़ सकता है। हालांकि कमजोर रुपया निर्यात को कुछ हद तक प्रतिस्पर्धी बनाता है, लेकिन भारत का आयात बिल, खासकर तेल का, इतना बड़ा है कि कुल मिलाकर घाटा बढ़ने की आशंका रहती है।
कॉरपोरेट मुनाफे पर असर: कॉरपोरेट सेक्टर भी इससे अछूता नहीं रहता। जिन कंपनियों का कच्चा माल या मशीनरी आयात पर निर्भर है, उनकी लागत बढ़ जाती है। इससे मुनाफा घटता है और शेयर बाजार पर नकारात्मक असर देखने को मिलता है।
कुल मिलाकर, रुपये की लगातार कमजोरी अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी संकेत है। यदि यह गिरावट लंबे समय तक जारी रहती है, तो महंगाई, निवेश और विकास दर पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है।
(PTI इनपुट के साथ)