अर्थव्यवस्था

रुपया गिरा, महंगाई बढ़ेगी! आम आदमी पर कितना असर?

ब्लूमबर्ग के मुताबिक घरेलू आर्थिक कमजोरी बड़ी वजह, RBI के कदम से बाजार का भरोसा नहीं लौटा

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बीएस वेब टीम   
Last Updated- April 03, 2026 | 8:55 AM IST

Indian Rupee Decline: पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने से पहले ही भारत की अर्थव्यवस्था में कमजोरी के संकेत दिखाई देने लगे थे। जैसे ही ईरान से जुड़े तनाव बढ़े और डॉलर सुरक्षित निवेश के रूप में मजबूत हुआ, रुपये पर दबाव और तेज हो गया। पिछले एक साल में एशिया की सबसे कमजोर करेंसी रहे रुपये ने 95 प्रति डॉलर का स्तर पार कर 95.12 का रिकॉर्ड निचला स्तर छू लिया। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध केवल एक ट्रिगर है, जबकि असली कमजोरी देश के अंदर की आर्थिक स्थिति से जुड़ी है।

RBI के कदम पर उठे सवाल

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों की डॉलर पोजिशन 100 मिलियन तक सीमित करने का फैसला बाजार को भरोसा दिलाने के बजाय उल्टा संकेत दे गया। निवेशकों ने इसे इस रूप में देखा कि RBI के पास रुपये को संभालने के पारंपरिक उपाय अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं। इससे सट्टेबाजों को मौका मिला और रुपये पर दबाव और बढ़ गया।

रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी केंद्रीय बैंक के सामने यह चुनौती होती है कि वह एक साथ मुद्रा को स्थिर रखने और ब्याज दरों को नियंत्रित करने दोनों काम नहीं कर सकता। RBI लंबे समय तक इस संतुलन को बनाए रखने की कोशिश करता रहा। गवर्नर संजय मल्होत्रा के कार्यकाल में ब्याज दरों में कटौती कर निवेश को बढ़ावा दिया गया और रुपये को कमजोर होने दिया गया ताकि निर्यात को सहारा मिल सके। लेकिन तेल की कीमतों में तेजी के बाद यह रणनीति दबाव में आ गई है। अब RBI के सामने ग्रोथ और मुद्रा स्थिरता के बीच कठिन चुनाव है।

Indian Rupee Fall: महंगाई और आम लोगों पर असर

रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। खासकर तेल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल, डीजल और गैस महंगे होते हैं, जिसका असर ट्रांसपोर्ट, खाद और खाने-पीने की चीजों तक पहुंचता है। इससे जीवन यापन की लागत बढ़ जाती है।

रुपये में गिरावट का असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों पर पड़ता है। अगर रुपया तेजी से कमजोर होता है, तो विदेशी शिक्षा का खर्च बढ़ जाता है, जिससे कई परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

सरकार को खाद और गैस जैसी जरूरी चीजों पर सब्सिडी बनाए रखने के लिए अधिक कर्ज लेना पड़ सकता है। इससे वित्तीय दबाव बढ़ेगा और सरकारी बॉन्ड की यील्ड भी ऊपर जा रही है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए फंड जुटाना मुश्किल हो सकता है।

विदेशी निवेशक डॉलर में रिटर्न को देखते हैं। रुपये के कमजोर होने से उनका मुनाफा घटता है, जिससे वे निवेश निकालते हैं। मार्च में भारतीय बाजार से करीब 12 अरब डॉलर की निकासी इसी का संकेत है, जिससे रुपये पर और दबाव बना।

गरीब वर्ग पर सबसे ज्यादा असर

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर गरीब और मजदूर वर्ग पर पड़ता है। टेक्सटाइल और डायमंड जैसे सेक्टर पहले से दबाव में हैं, वहीं खाड़ी देशों में काम करने वाले लोगों की नौकरियों पर खतरा बढ़ने से भारत आने वाला पैसा भी घट सकता है।

Indian Rupee Outlook: आगे की चुनौती

रिपोर्ट में कहा गया है कि RBI के हालिया कदमों से रुपये में थोड़ी मजबूती आई है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। जैसे-जैसे रुपया 100 के करीब पहुंच रहा है, ध्यान केवल इसे बचाने पर नहीं बल्कि इसके सामाजिक और आर्थिक असर को संभालने पर होना चाहिए। (ब्लूमबर्ग के इनपुट के साथ)

First Published : April 3, 2026 | 8:49 AM IST