भारत की सेवा गतिविधियां सितंबर महीने में गिरकर 6 महीने के निचले स्तर पर आ गई हैं। महंगाई के दबाव और प्रतिस्पर्धा की स्थिति के कारण नए काम और उत्पादन मार्च के बाद की तुलना में धीमी दर से बढ़े हैं। इसकी वजह से नौकरियों का सृजन प्रभावित हुआ है।
एसऐंडपी ग्लोबल द्वारा जारी सेवा क्षेत्र का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) सितंबर में गिरकर 54.3 पर पहुंच गया, जो अगस्त में 57.2 पर था। विदेश से कमजोर मांग का असर कुल मिलाकर बिक्री पर पड़ा और माह के दौरान अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर में और कमी आई।
सर्वे में सेवा गतिविधियों के लिए 50 से ऊपर अंक विस्तार और इससे नीचे का अंक संकुचन दिखाता है।
सर्वे में कहा गया है, ‘उत्पादन और नए कारोबार में सुस्त वृद्धि सेवा संबंधी अर्थव्यवस्था के 4 व्यापक क्षेत्रों में देखी गई। दोनों मामलों में सबसे तेज विस्तार उपभोक्ता सेवा में हुआ है, जबकि सबसे सुस्त वृद्धि परिवहन, सूचना और संचार में हुआ है।’
एसऐंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस में इकनॉमिक्स एसोसिएट डायरेक्टर पॉलियाना डी लीमा ने कहा कि महंगाई में वृद्धि ग्राहकों का व्यय घटा सकती है, साथ ही इससे कारोबारी विश्वास में कमी आ सकती है। इन मोर्चों पर भारत के सेवा क्षेत्र की आने वाले महीनों में परीक्षा की घड़ी है।
उन्होंने कहा, ‘माह के अंत में रुपया बहुत तेजी से गिरा है। अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी से भारत की अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त चुनौती मिल रही है। मुद्रा की अस्थिरता से महंगाई को लेकर चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि आयातित सामान और महंगे हो जाएंगे और निश्चित रूप से इसका आशय यह है कि रिजर्व बैंक ब्याज दर में बढ़ोतरी जारी रखेगा, जिससे रुपये को बचाया जा सके और कीमतों का दबाव कम हो।’
बार्कलेज इन्वेस्टमेंट बैंक में प्रबंध निदेशक राहुल बाजोरिया ने कहा कि विनिर्माण पीएमआई की तुलना में सर्विस पीएमआई कम रहना घरेलू मांग में तेजी का संकेत है। बाजोरिया ने कहा, ‘आज के पीएमआई के आंकड़ों से निश्चित रूप से समेकन के संकेत मिलते हैं। यह कर संग्रह, ईंधन में खपत, आवाजाही के आंकड़ों जैसे रेलवे व नागरिक उड्डयन की गतिविधियों सहित अन्य व्यापक आंकड़ों से भी पता चलता है। वित्त वर्ष 2022-23 में अभी भी सेवा पीएमआई व्यापक तौर पर 7 प्रतिशत वृद्धि के संकेत दे रहा है।’
सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक विनिर्माण पीएमआई तीन महीने के निचले स्तर 55.1 प्रतिशत पर पहुंच गया है।
वैश्विक व्यवधानों को देखते हुए शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए वृद्धि अनुमान घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया था, जबकि पहले 7.2 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया था।
रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने शुक्रवार के मौद्रिक नीति के बयान में कहा था, ‘भूराजनीतिक तनाव की अनिश्चितता, वैश्विक वित्तीय स्थिति में सख्ती और कुल मांग में विदेश की हिस्सेदारी में संभावित गिरावट के कारण वृद्धि नीचे जाने का जोखिम है।’
आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) और एसऐंडपी ने पिछले सप्ताह भारत के लिए वित्त वर्ष 2022-23 के अपने वृद्धि अनुमान में कोई बदलाव न करते हुए उसे क्रमशः 6.9 प्रतिशत और 7.3 प्रतिशत रखा था। इन संगठनों ने वृद्धि दर नीचे जाने के जोखिम का भी उल्लेख किया था।
ओईसीडी ने अपने अंतरिम आर्थिक परिदृश्य में कहा है, ‘विदेशी मांग कम रहने की वजह से भारत की सालाना वृद्धि कम रहने का अनुमान है। 2021-22 की 8.7 प्रतिशत सालाना वृद्धि घटकर वित्त वर्ष 23 में करीब 7 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2023-24 में 5.75 प्रतिशत रह सकती है। बहरहाल इसके बावजूद कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था को देखते हुए यह तेज वृद्धि है।’