देश में धान का सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले उत्तर प्रदेश में कमजोर मॉनसून ने इस बार किसानों के माथे पर शिकन गहरी कर दी हैं। जुलाई पूरा बीत गया है और अगस्त का पहला हफ्ता भी निकल चुका है मगर प्रदेश में अभी 25-30 फीसदी रकबे में भी धान की बुआई नहीं हो सकी है। सिंचाई और मॉनसून के सहारे बुआई करने वाले किसानों के सामने फसल बचाने का संकट है तो मक्का काटकर पछैती धान की फसल लगाने वालों को खेत खाली रखना पड़ सकता है।
उत्तर प्रदेश में धान का कटोरा कहलाने वाले गोंडा, बहराइच, मऊ, बस्ती, संतकबीरनगर, श्रावस्ती और बलिया जिलों में इस बार सामान्य से 40 फीसदी बारिश ही हुई है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के 19 जिलों में सामान्य से 40 फीसदी कम बारिश हुई है और 30 जिलों में बारिश 40 से 60 फीसदी ही रही है। केवल 16 जिलों में सामान्य की 60 से 80 फीसदी बारिश हुई है। पानी की अधिकता वाली धान और मेंथा जैसी फसलों के लिए मशहूर रामपुर जिले में तो सामान्य बारिश की 18 फीसदी बारिश ही हुई है।
बारिश ने राज्य के कृषि विभाग का गणित ही बिगाड़ दिया है। विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस बार प्रदेश में 96.03 लाख हेक्टेयर रकबे में खरीफ बुआई का लक्ष्य रखा गया था। किसानों को पिछले साल अच्छा भाव मिला था, जिसकी वजह से वे जोश में थे और माना जा रहा था कि बुआई बढ़कर 100 लाख हेक्टेयर के पार भी पहुंच सकती है। मगर अभी तक 81.49 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो सकी है, जो लक्ष्य की 85 फीसदी है। इसमें भी धान बुआई का रकबा 60 लाख हेक्टेयर रहने का अनुमान था मगर अभी 70 फीसदी रकबे में ही बुआई हो पाई है। हालांकि सरकार को अब भी उम्मीद है कि बुआई तेजी पकड़ रही है और सीजन खत्म होने तक धान बुआई लक्ष्य की 90 फीसदी तक पहुंच सकती है।
मगर किसानों की व्यथा दूसरी है। उनके लिए बुआई लक्ष्य तक पहुंचने से बड़ा संकट फसल बचाने का है। बलरामपुर जिले के उन्नत किसान कर्ण सिंह का कहना है कि बुआई के फौरन बाद और पकने के समय ज्यादा बारिश की जरूरत होती है। इस समय बुआई के बाद फसल बचाना मुश्किल है और आगे का कोई भरोसा ही नहीं है। सिंह कहते हैं कि कमजोर मॉनसून का असर धान पर ही नहीं बल्कि मक्का और अरहर जैसी फसलों पर भी हुआ है। मक्के की बालियां तो अंकुर फूटने के बाद सूख गई हैं। अरहर में दाने पड़ रहे थे, जो पानी नहीं मिलने से सूखे जा रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिक डा. सुशील कुमार सिंह कहते हैं कि बुआई कमजोर ही है तो उत्पादन भी घटेगा। अभी तक तो एक चौथाई बुआई भी नहीं हो पाई है, अगर मॉनसून ऐसे ही रूठा रहा तो रबी की फसल भी कमजोर रह जाएगी। धान की अगैती किस्म उगाने वाले किसानों का नुकसान हो ही चुका है मगर ऐसी खेती करने वालों की तादाद कम है। प्रदेश के बड़े हिस्सों में किसान मक्के की फसल काटने के बाद धान की खेती करते हैं।
जिन्होंने सिंचाई साधनों के साथ जुलाई में बुआई पूरी कर ली थी, उनकी भी हालत अच्छी नहीं है। सावन का महीना शुरू होने के बाद भी प्रदेश के ज्यादातर जिलों में जुलाई के आखिर में तापमान 40 डिग्री के आसपास रहा, जो फसल के लिए नुकसानदेह है। बंगाल की खाड़ी से आने वाली पुरवाई के कारण सिंचाई के साथ धान रोपाई करने वालों के खेत भी जल्दी सूख रहे हैं।
कृषि विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि जून में मामूली बारिश और सिंचाई के सहारे जिन किसानों ने धान की नर्सरी लगा ली, उन्हें भी बाद में रोपाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाया। आमतौर पर नर्सरी लगाने के बाद धान की रोपाई 25 से 30 दिन के भीतर कर ली जाती है। रोपाई में देर हो तो धान की फसल पर असर होता है और उत्पादन कम हो जाता है। इस बार बारिश की कमी से नर्सरी लगने के 40-50 दिन बाद धान की रोपाई हो पाई है, जिसका असर उत्पादन पर जरूर पड़ेगा।