मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि सरकार का मानना है कि वित्त वर्ष 2023 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर भारतीय रिजर्व बैंक के 7.2 प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 7.4 प्रतिशत वृद्धि के अनुमान के बीच रहेगी। अरूप रायचौधरी से बातचीत में उन्होंने कहा कि विकसित देशों में मंदी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी है, क्योंकि तेल व अन्य जिंसों के दाम कम हो रहे हैं और बढ़ती महंगाई का घरेलू दबाव कम हो रहा है। प्रमुख अंश…
पिछली मासिक आर्थिक रिपोर्ट में कहा गया था कि उपभोक्ताओं के भरोसे के साथ भारत के लिए स्थिति बेहतर लग रही है और निजी निवेश और संपर्क वाले क्षेत्रों सहित सभी क्षेत्रों में तेजी आ रही है। साथ ही भू-राजनीतिक अस्थिरता की भी बात कही गई थी। आप इस साल के शेष महीनों को किस दिशा में जाते देख रहे हैं?
कच्चे तेल की मांग तेजी से घट रही है। ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर या इससे नीचे है। मैं हमेशा कहता हूं कि निर्यात के हिसाब से वैश्विक आर्थिक मंदी अच्छी नहीं है। लेकिन भारत की ऊर्जा की आयात पर निर्भरता है और विकसित देशों द्वारा मौद्रिक सख्ती किए जाने व वैश्विक मंदी का कुल मिलाकर असर देखें तो यह भारत के लिए बेहतर है। भूराजनीतिक हलचलों का हम अनुमान नहीं लगा सकते। इसकी चुनौती हमेशा रहती है। लेकिन हमने पहले 6 महीने में बेहतर किया है और उम्मीद है कि आगे भी हम सही राह पर रहेंगे। हम भारतीय रिजर्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान के बीच की वृद्धि दर हासिल कर लेंगे।
कई एजेंसियों ने वित्त वर्ष 23 में जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान घटा दिया है, आप अभी भी रिजर्व बैंक के अनुमान पर अडिग हैं?
सरकार का अभी भी मानना है कि रिजर्व बैंक के 7.2 प्रतिशत और आईएमएफ के 7.4 प्रतिशत वृद्धि के अनुमान के बीच वृद्धि दर रहेगी। अगर इन दोनों अनुमानों से बेहतर वृद्धि दर हासिल होती है तो मुझे व्यक्तिगत रूप से कोई आश्चर्य नहीं होगा।
भारत वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ा है। चीन में प्रतिबंधों और पश्चिमी देशों में मंदी को लेकर आप आर्थिक परिदृश्य पर क्या असर देख रहे हैं?
व्यापार निश्चित रूप से प्रभावित होगा। वहीं कच्चे तेल की कीमत कम होने की वजह से आयात बिल कम होगा और उसका प्रबंधन हो सकेगा। मुझे लगता है कि वैश्विक वृद्धि पर असर पड़े या नहीं, विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक सख्ती से लोगों की क्रय शक्ति घट रही है, जिससे महंगाई कम होगी। और ऐसे में मुझे लगता है कि मंदी रहेगी। भारत के लिए सकारात्मक बात यह है कि कच्चे तेल व अन्य जिंसों के दाम कम होने से औद्योगिक सामान और सामान्य रूप से खाद्य की आपूर्ति सस्ती होगी।
वित्त मंत्री ने हाल में कहा था कि मौद्रिक नीति से ही महंगाई का प्रबंधन नहीं होता, और भी चीजें महंगाई को प्रभावित करती हैं। क्या इसका आशय यह है कि हम कुछ और राजकोषीय कदम देख सकते हैं?
मैं वित्त मंत्री के बयान पर कोई अनुमान लगाने नहीं जा रहा हूं। सरकार हमेशा विकल्प तलाशती है, जो आंकड़ों और प्रगति पर निर्भर होता है।
जी-20 में भारत के एजेंडे में बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार शामिल है। भारत के लिए यह एजेंडा कितना अहम है?
जी-20 के अध्यक्ष के रूप में भारत सिर्फ भारतीय दृष्टिकोण से इन मसलों को नहीं देख रहा है, बल्कि पूरे जी-20 के सदस्यों और इससे इतर भी इसके असर पर विचार कर रहा है। मौजूदा स्थिति में जलवायु परिवर्तन के लिए वित्तपोषण, ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव के लिए वित्तपोषण आदि अहम है। बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों को इन कवायदों को गति देने के लिए कदम उठाने हैं।
निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय पर आपकी क्या राय है? क्या यह मजबूती से बढ़ रहा है?
मुझे लगता है कि ऐसा हो रहा है। अगर आप फर्मों के सीईओ द्वारा व्यक्त धारणाओं को देखें तो निश्चित रूप से वास्तविक निवेश की दिशा में हम आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। गैर खाद्य कर्ज में भी वृद्धि शुरू हो गई है। पूंजी बाजार में आईपीओ आने शुरू हो गए हैं। मुझे लगता है कि बहुत उत्साहजनक संकेत हैं।