प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की वरिष्ठ रोजगार विशेषज्ञ राधिका कपूर ने कहा कि अगर शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं की उपलब्धता में सुधार से बेहतर रोजगार पाना है तो मजबूत श्रम मांग जरूरी है। उन्होंने आपूर्ति-पक्षीय हस्तक्षेपों से परे नीतिगत ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया।
कपूर ने शुक्रवार को नई दिल्ली में यूएनयू-वाइडर विकास सम्मेलन में ‘खंडित विश्व व्यवस्था में हरित औद्योगीकरण और समावेशी विकास’ विषय पर कहा, ‘स्कूलिंग, उच्च शिक्षा या किसी प्रकार की आय सहायता तक पहुंच बढ़ाने वाली नीतियां भागीदारी और क्षमताओं में सुधार करती हैं लेकिन पूरक संरचनात्मक स्थितियों के अभाव में वे अपने आप बेहतर परिणाम नहीं देतीं।’
कपूर ने कहा कि श्रम बाजार की स्थिति, नौकरियों की कमी और संस्थागत कारकों जैसी संरचनात्मक बाधाएं पहुंच बढ़ाने वाली नीतियों से मिलने वाले लाभों को सीमित कर सकती हैं। ऐसे मामलों में बेहतर शिक्षा या उच्च श्रम बल भागीदारी का बेहतर रोजगार परिणामों में तब्दील होना जरूरी नहीं है।
कपूर ने कहा कि भारत में शिक्षा का स्तर बढ़ा है लेकिन रोजगार के परिणाम खासकर युवा और अधिक शिक्षित श्रमिकों के लिए हमेशा तालमेल नहीं बिठा पाए हैं । हालांकि भारत की बेरोजगारी दर कई देशों की तुलना में कम है, फिर भी कार्यबल का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है।
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट’ के अनुसार 2023 में 20-29 आयु वर्ग के बेरोजगार भारतीयों में से दो-तिहाई से अधिक स्नातक थे। बेरोजगारों में डिग्री धारकों का हिस्सा 2017 में 46 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 67 प्रतिशत हो गया जबकि पिछले दशक में भारत में शैक्षिक स्तर में वृद्धि हुई है। इसमें अधिक संख्या में युवा उच्च शिक्षा पूरी करके श्रम बाजार में प्रवेश कर रहे हैं।
कपूर ने कहा, ‘हमारे पास आपूर्ति पक्ष पर काम करने वाली ये सभी नीतियां हैं – श्रम आपूर्ति का विस्तार, शिक्षा में सुधार, लोगों को श्रम बल में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना – लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि मांग पक्ष पर क्या हो रहा है।’
श्रम बल का विस्तार और मानव पूंजी में सुधार आपूर्ति पक्ष के विकास को दर्शाते है। हालांकि नीतिगत चर्चाओं में इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि अधिक शिक्षित कार्यबल को समायोजित करने के लिए श्रम मांग कैसे बढ़ेगी।
आर्थिक विकास की संरचना और उद्योगों की संरचना रोजगार परिणामों को प्रभावित करती है। उच्च शिक्षा प्राप्त लोग अक्सर औपचारिक रोजगार के अवसरों तक पहुंच बनाकर या उच्च उत्पादकता वाले उद्यम शुरू करके कल्याणकारी कार्यक्रमों से लाभ उठाने के लिए बेहतर स्थिति में होते हैं। उन्होंने बताया, ‘उच्च शिक्षा वाले राज्यों में संभवतः अधिक विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्थाएं और अधिक आधुनिक क्षेत्र होते हैं। इसलिए अधिक शिक्षित लोगों के लिए लाभकारी और उत्पादक रोजगार के अवसरों में प्रवेश करने के बेहतर अवसर होते हैं।’
कपूर ने कहा कि औद्योगिक और क्षेत्रीय नीतियां श्रम मांग को मजबूत करने और शिक्षा व मानव पूंजी विकास को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बेहतर ढंग से ढालने में सहायक हो सकती हैं। कपूर ने कहा कि औद्योगिक नीति के साथ-साथ राजकोषीय, मौद्रिक और व्यापार नीतियों जैसे व्यापक मैक्रोइकनॉमिक उपाय भी अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन और श्रम मांग को प्रभावित करते हैं।