देश में जल्द ही करीब एक दर्जन प्रमुख परमार्थ संस्थानों के कर लाभ की जांच की जा सकती है। इन परमार्थ संस्थानों में निजी ट्रस्ट, शैक्षणिक सोसाइटी, वैधानिक प्राधिकरण, क्रिकेट एसोसिएशन आदि शामिल हैं। इनमें अधिकतर काफी मुनाफा कमा रहे हैं लेकिन परमार्थ संस्थान के तमगे के कारण कर लाभ का फायदा भी उठा रहे हैं।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि राजस्व विभाग इन परमार्थ संस्थानों के बहीखाते की जांच के लिए एक मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार कर कर रहा है। उन्होंने कहा कि विभाग यह देखने की कोशिश करेगा कि सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले के बाद उनके कर लाभ को बरकरार रखा जा सकता है अथवा नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि जो संस्थान, ट्रस्ट अथवा निकाय ‘सामान्य सार्वजनिक जनसेवा’ की आड़ में वाणिज्यिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं और नाममात्र से अधिक शुल्क लेते हैं वे कर छूट की मांग नहीं कर सकते हैं।
अधिकारी ने कहा कि इस संबंध में जल्द ही आकलन अधिकारियों को दिशानिर्देश अथवा प्रक्रिया की जानकारी दी जाएगी। अधिकारी के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सार तैयार किया जा रहा है और उसी आधार पर दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।
एक अन्य सरकारी अधिकारी ने कहा कि आकलन से पता चलता है कि वाणिज्यिक गतिविधियों में शामिल करीब 50 संस्थान वर्षों से लाभप्रद होने के बावजूद कर में छूट का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये संस्थान काफी अधिक शुल्क और उपकर वसूल रहे हैं जिससे उनका मार्जिन 40 से 60 फीसदी के दायरे में है।
अधिकारी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यह बिल्कुल स्पष्ट है कि राजस्व की वार्षिक जांच अवश्य होनी चाहिए ताकि प्राप्तियों और आय के आधार पर पता चल सके कि संस्थान वाणिज्यिक गतिविधियों में संलिप्त है अथवा नहीं। यदि वह वाणिज्यिक गतिविधियों में शामिल है तो यह देखा जाना चाहिए कि कहीं वह कर में छूट के लिए निर्धारित सीमा का उल्लंघन तो नहीं करता।
अधिकारी ने संकेत दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद सरकार भी कुछ प्रावधानों में संशोधन कर सकती है ताकि कमियों को दूर किया जा सके। आयकर विभाग पंजीकरण के नवीनीकरण अथवा कर निर्धारण के दौरान अन्य लाभप्रद परमार्थ संस्थानों की सख्ती से जांच करेगा।
एक अन्य अधिकारी ने कहा, ‘आकलन अधिकारी अलग-अलग मामले के आधार पर जांच करेगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि आयकर अधिनियम की धारा 2 (15) का उल्लंघन तो नहीं किया जा रहा। इस धारा के तहत कर लाभ लेने के लिए शुल्क, उपकर आदि की सीमा भी निर्धारित की गई है।’
अधिकारी ने कहा कि शैक्षणिक ट्रस्टों की भी बारीकी से जांच करने की आवश्यकता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वे किस हद तक वाणिज्यिक गतिविधियों में शामिल हैं। उसी आधार पर उन्हें कर के दायरे में लाया जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह शैक्षणिक ट्रस्टों द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें आयकर अधिनियम के तहत कर छूट की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आयकर में छूट का लाभ लेने वाले शैक्षणिक संस्थानों को पूरी तरह शिक्षा एवं संबंधित गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
अब तक शैक्षणिक ट्रस्टों को यह दिखाना होता है कि वे ‘मुख्य रूप से’ शिक्षा संबंधी गतिविधियों में शामिल हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह पर्याप्त नहीं है। इसलिए अब उन्हें यह बताना होगा कि वे किन शैक्षणिक गतिविधियों में शामिल हैं।