पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की अप्रैल बैठक की चर्चाओं को भी प्रभावित किया। एमपीसी के सदस्यों ने सर्वसम्मति से नीतिगत रीपो दर को अपरिवर्तित रखने और अनिश्चितता के बीच तटस्थ नीति रुख बनाए रखने पर सहमति जताई। अधिकांश सदस्यों ने बाहरी क्षेत्र में हालात बिगड़ने के जोखिम की ओर संकेत किया क्योंकि वे चालू खाते के घाटे के बढ़ने की संभावना देख रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि अल नीनो की परिस्थितियां मुद्रास्फीति पर दबाव डालेंगी।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई चुनौतियां पेश करता है। इनमें निर्यात, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की कीमतों में इजाफा, धन प्रेषण तथा वैश्विक मांग में कमी आदि शामिल हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि 2026-27 के लिए दृष्टिकोण चुनौतियों के बावजूद सतर्क रूप से सकारात्मक बना हुआ है, क्योंकि सेवाएं, कृषि और स्वस्थ बैलेंस शीट वृद्धि को समर्थन देती रहेंगी।
उन्होंने कहा, ‘निजी उपभोग और निवेश के लचीला बने रहने की उम्मीद है, जिसे ग्रामीण मांग में सुधार, सतत सार्वजनिक खर्च और निजी पूंजीगत निवेश में वृद्धि से बल मिलेगा।’ उन्होंने यह भी कहा कि सेवाओं के निर्यात और हालिया व्यापार समझौते अतिरिक्त समर्थन प्रदान करेंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, जिन्हें पूरी तरह से कम होने और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बहाल होने में अधिक समय लग सकता है, वृद्धि के लिए नकारात्मक जोखिम और मुद्रास्फीति के लिए सकारात्मक जोखिम पैदा करते हैं।
उन्होंने कहा कि इस वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है और इन झटकों को सहन करने में सक्षम है। उन्होंने कहा, ‘यदि संघर्ष लंबे समय तक अनसुलझा रहता है, तो यह केंद्रीय बैंकों के लिए मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को नियंत्रित करने और वृद्धि के बलिदान को न्यूनतम करने के प्रयासों को कठिन बना सकता है।’
उन्होंने कहा कि अस्थायी युद्धविराम की घोषणा के साथ संघर्ष के शीघ्र समाधान और आपूर्ति श्रृंखलाओं के सामान्यीकरण की संभावना है और ऐसी स्थिति में कोई निर्णायक कदम उठाने से पहले प्रतीक्षा और निगरानी करना ही विवेकपूर्ण होगा। दो सप्ताह का युद्धविराम 8 अप्रैल को मौद्रिक नीति घोषणा के दिन सुबह घोषित किया गया था। रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि वर्तमान हालात में केंद्रीय बैंकों को अर्थव्यवस्था की उत्पादक आवश्यकताओं को समर्थन देने में मददगार भूमिका निभाते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘भविष्य की नीतिगत कार्रवाई डेटा पर आधारित होनी चाहिए।’ उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति और जीडीपी वृद्धि के संशोधित आंकड़ों पर टिप्पणी करते हुए गुप्ता ने कहा, ‘संशोधित श्रृंखला अधिक स्थिर आंकड़े देगी, जिससे जीडीपी श्रृंखला में कम महत्त्वपूर्ण संशोधन की आवश्यकता होगी और मुद्रास्फीति के आंकड़े कम अस्थिर और अधिक सटीक होंगे।’
एक अन्य आंतरिक सदस्य इंद्रनील भट्टाचार्य ने कहा कि मौद्रिक नीति की क्षमता आपूर्ति-जनित मुद्रास्फीति के प्रत्यक्ष प्रभावों को कम करने में सीमित है। ‘यह केवल तभी परिचालन रूप से प्रासंगिक होती है जब द्वितीयक प्रभाव स्पष्ट हो जाते हैं।’उन्होंने कहा कि ऊंची ऊर्जा कीमतों का घरेलू मुद्रास्फीति पर प्रभाव अब तक सीमित रहा है क्योंकि खुदरा ईंधन कीमतें अपरिवर्तित हैं, लेकिन आगे चलकर कच्चे माल की लागत में वृद्धि कीमतों पर दबाव डाल सकती है।
एमपीसी के बाहरी सदस्य राम सिंह ने चेतावनी दी कि पश्चिम एशिया संघर्ष भारत के वृद्धि-मुद्रास्फीति संतुलन को फरवरी 2026 में मौजूद ‘गोल्डीलॉक्स स्थिति’ (कम मुद्रास्फीति और ऊंची वृद्धि) से उलट हालात में ले जा सकता है। एक अन्य बाहरी सदस्य सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष में शत्रुता समाप्त होने के अस्थायी संकेतों और इसके परिणामस्वरूप वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों में ढील के बावजूद, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में लगातार बनी हुई अव्यवस्थाओं को लेकर अनिश्चितता अभी भी अधिक है।
मुद्रास्फीति पर भट्टाचार्य ने कहा, ‘हमने कुछ निजी मौसम विज्ञान संगठनों के प्रारंभिक पूर्वानुमानों पर ध्यान दिया है, जिनमें गर्मियों के अधिक गर्म होने और अल नीनो की संभावित शुरुआत की संभावना जताई गई है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘और भी चिंताजनक’ यह है कि मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं बढ़ती मुद्रास्फीति के जोखिम का संकेत देती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का भुगतान संतुलन और व्यापार प्रभावित होने की संभावना है।